प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -अगस्त क्रांति पर देश नहीं बिकने देंगे की अनुगूंज

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -अगस्त क्रांति पर देश नहीं बिकने देंगे की अनुगूंज

सुभाष मिश्र - प्रधान संपादक आज की जनधारा

एक तरफ जब देश का संपन्न वर्ग मध्यम वर्ग और धर्मपरायण जनता टीवी चैनलों के साथ 'जय जय सियाराम के जयघोष में व्यस्त है। कोरोना वायरस से बचने के लिए मास्क लगाकर दो गज की दूरी के साथ ज्यादातर समय घर में व्यतीत कर रही है। ऐसे समय में देश का मेहनतकश तबका अगस्त क्रांति के नारे 'अंग्रेजों भारत छोड़ो को याद करते हुए पूरी एकजुटता के साथ 'देश नहीं बिकने देंगे का नारा बुलंद कर रहा है। कर्ज नहीं, कैश दो, कार्पोरेट भगाओ किसानी बचाओ नारे के साथ सरकार की मजदूर किसान विरोधी और कार्पोरेट परस्त नीतियों के खिलाफ  लामबंद है।

देश में कोरोना संकट के बाद उपजी भीषण आर्थिक तंगी और बेरोजगारी के बीच केन्द्र सरकार द्वारा जरूरी बुनियादी मुद्दों से ध्यान भटकाकर, कार्पोरेट हित में लिए जा रहे निर्णयों का विरोध करते हुए देश के किसान, मजदूर, श्रमिक, कर्मचारी एक साथ पूरे देश में प्रदर्शन कर रहे हैं। 9 अगस्त 1942 को मुंबई के एक पार्क से शुरू हुए इस आंदोलन के जरिये और देश के करोड़ों लोगों ने आजादी की इच्छा जाहिर कर अंग्रेजों को भारत छोडऩे की अंतिम चेतावनी दी थी। आंदोलन में जनता खुद अपनी नेता थी। आजादी के बाद हमारे देश के नेताओं ने और संविधान निर्माताओं ने देश को लोकतांत्रिक, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, संविधान दिया था, वह पूंजीवादी और सामंतवाद के गठजोड़ से नहीं बच पाया। आज देश में चंद मुट्ठी भर पूंजीपति और कार्पोरेट का कब्जा है। गोदी मीडिया वही भाषा बोल रहा है जो ये चाहते हैं। देश के मेहनतकशों की आवाज को अलग-अलग इवेंट के जरिये भरमाने की कोशिशें जारी हैं।

देश के प्रधानमंत्री ने पहले 20 लाख करोड़ का जो आर्थिक पैकेज घोषित किया था, वह भी अभी तक फलीभूत नहीं हुआ है। वहीं दूसरी ओर उन्होंने कृषि इंफ्रास्ट्रक्टर फंड के तहत एक लाख करोड़ की वित्त पोषण सुविधा को लांच कर देश के 8.55 करोड़ किसानों को 17100 करोड़ रूपये की छटी किश्त जारी की है। देश के अलग-अलग राज्यों में भी इसी तरह किसानों को आर्थिक मदद पहुंचाने की पहल हुई है, किंतु इन सबसे किसानों के हालत में कोई सुधार नहीं हुआ है। यही वजह है कि वे अगस्त क्रांति दिवस पर भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति, भूमि अधिकार आंदोलन और केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के देशव्यापी आंदोलन प्रारंभ किया गया है। कोरोना संकट के मद्देनजर गरीबों को प्रति माह प्रति व्यक्ति 10 किलो अनाज और एक-एक किलो दाल, शक्कर, तेल और प्रति परिवार 10,000 रुपये नगद राशि से मदद करने, कोयला बैंक बीमा और रेलवे सहित अन्य सार्वजनिक उद्योगों के निजीकरण पर रोक लगाने, मनरेगा में 200 दिन काम और 600 रुपये रोजी देने, बिजली कानून मंडी कानून आवश्यक वस्तु, कृषि व्यापार और ठेका कृषि से संबंधित मजदूर-किसान विरोधी अध्यादेशों और प्रशासकीय आदेशों को वापस लेने, किसानों को डीजल आधी कीमत पर उपलब्ध कराने, फसल का समर्थन मूल्य लागत को डेढ़ गुना घोषित करने, किसानों पर चढ़ा सभी प्रकार का कर्जा माफ  करने, आदिवासियों का जल-जंगल-जमीन से विस्थापन रोकने और वनाधिकार कानून पेसा और 5वीं अनुसूची के प्रावधानों को लागू करने, सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं को सार्वभौमिक बनाने और सभी लोगों का कोरोना टेस्ट किए जाने की मांग आंदोलन के जरिये से जोर-शोर से उठाई जा रही है। इस राष्ट्रव्यापी आंदोलन के जरिये कहा गया है कि कृषि क्षेत्र में जो परिवर्तन किए गए हैं, उसने कृषि व्यापार करने वाली देशी-विदेशी कॉर्पोरेट कंपनियों और बड़े आढ़तियों द्वारा किसानों को लूटे जाने का रास्ता साफ  कर दिया है, और वे समर्थन मूल्य की व्यवस्था से भी बाहर हो जाएंगे। बीज और खाद्यान्न सुरक्षा व आत्मनिर्भरता भी खत्म हो जाएगी। मोदी सरकार आत्मनिर्भरता के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों और धरोहरों को चंद कारपोरेट घरानों को बेच रही है।

आंदोलन के जरिये यह भी कहा जा रहा है कि देश में आर्थिक मंदी से निपटने के लिए जहां सरकार को सार्वजनिक एवं सरकारी संस्थानों से प्राप्त आय के आधार पर संसाधनों का उपयोग कर कारगर कदम उठाना चाहिए। सरकार आत्मनिर्भर भारत के नाम पर इन संपत्तियों को सार्वजनिक संस्थानों को जिसमें भेल, सेल, बीमा, रेलवे, रक्षा संस्थानों को शीघ्रता से कारपोरेट जगत को सस्ते मूल्य पर उपहार स्वरूप देने के लिए तैयार है। केन्द्र सरकार ने निजीकरण की दिशा में 18 क्षेत्रों की पहचान की है। इसमें बैंकिंग, बीमा, इस्पात, उर्वरक, पेट्रोलियम और रक्षा उपकरण आदि क्षेत्र शामिल हैं।

सेवा क्षेत्र हैं, पावर ट्रांसमिशन, अंतरिक्ष, हवाई अड्डों, बंदरगाहों, राजमार्गों और गोदामों का विकास और संचालन और गैस ट्रांसपोर्टेशन और लॉजिस्टिक गैस और पेट्रो-केमिकल ट्रेडिंग शामिल नहीं है। रणनीतिक क्षेत्रों और उपक्षेत्रों से जुड़ा तकनीकी परामर्श और अनुबंध और निर्माण बुनियादी ढांचे के लिए वित्तीय सेवाएं, निर्यात, ऋण गारंटी, ऊर्जा और आवास क्षेत्र, दूरसंचार और आईटीए बैंकिंग और बीमा से संबंधित सेवाएं है।

इसका सबसे ज्यादा असर बैंकिंग जैसे क्षेत्रों में होने की उम्मीद है, जहां बड़ी संख्या में सरकारी स्वामित्व वाले बैंक संचालित होते हैं। पिछले साल सरकारी स्वामित्व वाले 10 बैंकों का विलय करके चार बैंक बनाए जाने और 2017 और 2018 में हुए विलय के बाद भी भारत में अभी सरकारी स्वामित्व वाले 12 बैंक हैं जिन्हे पांच किया जा सकता है।

आंदोलन के जरिय से देश में किसानों की बढ़ती आत्महत्या, लोगों द्वारा छीने जा रहे रोजगार के अवसर, बेरोजगारों की बढ़ती हुई मौत, बढ़ती हुई फौज एवं देश में बढ़ती महंगाई आदि पर भी चिंता जताई। केंद्र एवं राज्य सरकार द्वारा सरकारी कर्मचारियों के लिए मुख्य मांगों में से पुरानी पेंशन योजना लागू कर नई पेंशन योजना को समाप्त किया जाना, कर्मचारियों के लंबित महंगाई भत्ते, वेतनवृध्दि का भुगतान किया जाना, लंबित वेतन वृद्धि का भुगतान करना चाहिए। अगस्त क्रान्ति यानी 9 अगस्त को देशव्यापी मजदूर-किसान आंदोलन में किसान संगठनो के साथ केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के आह्वान पर संगठित और असंगठित क्षेत्र के मजदूर भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। आंदोलन को वामपंथी पार्टियों का भी समर्थन प्राप्त है। केन्द्र सरकार द्वारा कृषि कानूनों में किये गए परिवर्तन किसान विरोधी है, क्योंकि इससे फसल के दाम घट जाएंगे खेती की लागत महंगी होगी। ये परिवर्तन पूरी तरह कॉरपोरेट सेक्टर को बढ़ावा देते हैं और उनके द्वारा खाद्यान्न आपूर्ति पर नियंत्रण से जमाखोरी व कालाबाजारी को बढ़ावा मिलेगा। किसान संगठनों का आरोप है कि कोरोना संकट की आड़ में मोदी सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के निजीकरण के जरिये देश की राष्ट्रीय संपत्तियों को बेच रही है। ठेका खेती की इजाजत देकर और कृषि व्यापार में लगे प्रतिबंधों को खत्म करके देश की खाद्य और बीज सुरक्षा और खेती-किसानी को तहस-नहस कर रही है। किसान संगठन इतने बड़े देश में एक बाजार की कल्पना को वास्तव में किसानों के हितों से खिलवाड़ करना और कॉरपोरेटों के हितों को पूरा करना बता रहे हैं।

हमारे देश के मेहनतकशजनों की तरह बाकी जनता भी धीरे-धीरे यह समझने लगेगी की उसे भी कार्पोरेट पूंजी और उसके गठबंधनों के खिलाफ  लामबंद हुए कुछ हासिल नहीं होगा।