प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - ये आजादी सबकी है

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - ये आजादी सबकी है

-सुभाष मिश्र

यह आजादी के स्वप्न भंग का दौर है, हम जिस आजाद भारत में रह रहे हैं वह किसी एक जाति धर्म के द्वारा हासिल आजादी नहीं है। जब कुछ लोग इसे अपना बताकर बाकियों को पराया बताने की कोशिश करते हैं तो राहत इंदौरी जैसे शायर को कहना पड़ता है।

'सभी का खून है शामिल यहाँ की मिटटी में
किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है।

आज यह बताने की कोशिश की जा रही है कि यह देश और आजादी कुछ खास लोगों की वजह से है। 1847 की क्रांति में जिन लोगों ने भाग लिया है या गांधीजी के नेतृत्व में अंग्रेजों भारत छोड़ों का बिगुल फूंका हो, वे लोग किसी धर्म जाति से नहीं बंधे थे, उन सबका एक ही धर्म था अपने देश को अंग्रेजों की गुलामी से आजाद करना। अंग्रेजों द्वारा 'फूट डालो राज करोÓ की जिस नीति का बीज हमारे देश में बोया गया था, आज लोग उसी तरह का बीज बोकर देश की एकता, अखंडता, भाईचारा को नुकसान पहुंचाना चाहते हैं। महात्मा गांधी का भी आजादी को लेकर यह कहा था कि 'स्वतंत्रता की मेरी संकल्पना कोई संकुचित संकल्पना नहीं है। उसमें मनुष्य की अपने संपूर्ण ऐश्वर्य के साथ पूर्ण स्वतंत्रता समाविष्ट है। जहां तक मेरी मान्यता है, यदि भारत अपनी सीमाओं के भीतर पैदा होने वाले दीनतम प्राणियों तक को स्वतंत्रता की गारंटी नहीं देता, तो उसे स्वतंत्र भारत नहीं कहा जाएगा। मैं ऐसे संविधान के लिए प्रयास करूंगा जो भारत को हर प्रकार की दासता और संरक्षण से मुक्त कर दे और जरूरी हो तो, उसे पाप करने का अधिकार भी दे। जो लोग खुद आजाद होना चाहते हैं, वे दूसरों को गुलाम बनाने की बात नहीं सोच भी नहीं सकते।

शहीद भगतसिंह ने देश की आजादी कैसी हो को लेकर कहा था-कि 'क्रांति से हमारा अभिप्राय है अन्याय पर आधारित मौजूदा समाज व्यवस्था में आमूल परिवर्तन हैÓ। जवाहर लाल नेहरू कहते हैं की आखिर हिन्दुस्तान एक आज़ाद मुल्क है, जब हम आज़ादी के दरवाज़े पर खड़े है। हम इसको खास तौर से याद रखें कि हिन्दुस्तान किसी एक फिरके का मुल्क नहीं है। एक मजहब वालों का नहीं है, बल्कि बहुत सारे और बहुत किस्म के लोगों का है। बहुत धर्म और मजहबों का है।

महात्मा गांधी हो या शहीद भगत सिंह या जवाहर लाल नेहरू हों उन्होंने जिस आजादी की कल्पना की थी, आजादी के बाद भी भारतीय समाज उस आजादी से वंचित है।
शहीद भगत सिंह, राजगुरू, सुखदेव ने फांसी पर लटकने से पहले यह गीत भी गाया था-
'कभी वो दिन भी आएगा
कि जब आजाद हम होंगे
ये अपनी ही जमीं होगी
ये अपना आसमां होगा।।

आजादी के बाद देश में जिन मूल्यों को लेकर आजादी का स्वप्न बुना गया था, जब उन मूल्यों की अनदेखी होने लगी और अंग्रेजों की जगह कुछ काले-देशी लोगों ने वही करना शुरु किया जो अंग्रेज कर रहे थे, तो इसे देखकर हमारे साहित्यकार, गीतकारों ने मौजूदा हालात को बयां करने वाली रचनाएं लिखी। जनकवि बाबा नागार्जुन ने लिखा -
'किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है?
कौन यहां सुखी है, कौन यहां मस्त है?
सेठ है, शोषक है, नामी गला-काटू है
गालियां भी सुनता है, भारी थूक-चाटू है
चोर है, डाकू है, झूठा-मक्कार है
कातिल है, छलिया है, लुच्चा-लबार है
जैसे भी टिकट मिला, जहां भी टिकट मिला
शासन के घोड़े पर वह भी सवार है
उसी की जनवरी छब्बीस
उसी का पंद्रह अगस्त है।।

दुष्यंत कुमार ने अपनी गजल में कहा-
'कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये
कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये
कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए,
मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान है।

मंचों और नुक्कड़ो पर होने वाली नाट्य प्रस्तुतियों में भी इसी तरह के भाव की अभिव्यक्ति देखने को मिलती है। 'गोरे हाकिम भागे रे भैया आ गए हाकिम काले बदल गई है। चाबी लेकिन बदले नहीं है ताले मैं हूं थानेदार रे भैया, मैं हूं सूबेदार, पहले एक मुर्गी खाता था अब खाता हूं चारÓ। आजादी के बाद के भारत की स्थिति को देखकर हरिशंकर परसाई ने लिखा था की 'धार्मिक उन्माद पैदा करना, अंधविश्वास फैलाना, लोगो को अज्ञानी और क्रूर बनाना राजसत्ता, धर्मसत्ता और पुरूषसत्ता का पुराना हथकंडा है।

आजादी के 74 साल पूरे होने पर आत्मनिर्भर भारत की बात हो रही है। राम राज्य लाने के लिए सरकार और बहुत सारे लोग कटिबध्द हैं, इस बीच में कोरोना संक्रमण के चलते देश आर्थिक मंदी से गुजर रहा है। करोड़ों लोगों की नौकरी, रोजी, रोजगार छिन गए हैं। देश की राजनीतिक दल अपने-अपने राजनीतिक एजेंडे में लगे हुए हैं। पूरे देश में एनआरसी और एनसीआर को लेकर भम्र की स्थिति बनी हुई है। बहुत सारे लोग कश्मीर में धारा 370 हटाने से खुश हो सकते हैं और उसे अपना अविभाज्य अंग बताते हुए पाक अधिकृत कश्मीर पर कब्जे की बात करते हों पर हकीकत यह है कि एक साल भी कश्मीर में जनजीवन सामान्य नहीं हो पाया है। नागरिक सुविधाएं बहाल नहीं हो पाई है। चीन जैसा हमारा पड़ोसी राष्ट्र जिसे 1962 की युद्ध के बाद हमारे संबंध मधुर हो गए थे और दोनों देशों के बीच घनिष्ठ व्यापारी संबंध बन गए थे, वो देश भी हमें आँख दिखाते हुए हमारी सीमाओं पर कब्जा कर रहा है। नेपाल जिसे हम हिन्दु राष्ट्र मानकर अपना छोटा भाई मानते थे वो तक हमें देख लेने की धमकी दे रहा है। आज पूरा विश्व जानता है कि कोई भी देश बिना महाशक्तियों तथा कारपोरेट घरानों के हित-अहित देखकर ही किसी भी देश से लडऩे की जुर्रत कर सकता है। अब देशों की बीच अपनी सीमाओं को लेकर नहीं महाशक्तियों के वर्चस्व और पूंजीवादी व्यवस्था के नफे-नुकसान के कारण युद्ध संभव है, पर इसका असर किसी देश तक न होकर पूरी दुनिया में होता है। जी8 के देश चाहे वे फ्रांस, अमेरिका, ब्रिट्रेन, रूस, जर्मनी, जापान, इडली, कनाडा ही क्यों ना हो अब इमरजिंग मार्केट के चलते पांच ऐसे देशों को भी बुलाते हैं जहां उनका सामान बिक सके। हमारा देश भी इमरजिंग मार्केट है। शेयर बाजारों के उछाल और गिरावट से चलने वाले विश्व बाजार को नियंत्रित करने वाली शक्तियां ही अप्रत्यक्ष रूप से किसी भी देश को संचालित करती है। चाहे वह विश्वबैंक हो या अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष हो।