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प्राचार्य, प्रधान पाठक, संस्थान प्रमुख की भूमिका

प्राचार्य, प्रधान पाठक, संस्थान प्रमुख की भूमिका

सुभाष मिश्र

मुखिया मुख सो चाहिए, खान-पान को एक, 

पाले पोसे सकल अंग, तुलसी सहित विवेक 

गोस्वामी तुलसीदास ने भले ही यह दोहा मर्यादा पुरूषोत्तम राजा राम को लेकर लिखा हो पर मैं आज बात कर रहा हूं हमारे स्कूल, कॉलेज के प्रधान पाठक, प्राचार्य के संदर्भ में। ये बात किसी कार्यालय के प्रमुख को भी लेकर कही जा सकती है परंतु उनका फलक उतना व्यापक और लोकशिक्षण, संस्कारों से जुड़ा नहीं है जितना कि शिक्षा संस्थानों के प्रमुख का। किसी भी शिक्षण, प्रशिक्षण संस्थान का प्रमुख और उसके कुछ सहयोगी मिलकर चाहें तो बिना ज़्यादा आर्थिक संसाधनों के वो सब कार्य कर सकते हैं, जो उस संस्थान को आदर्श और अनुकरणीय बनाते हैं।

हमारे शासकीय स्कूल, कालेज, अस्पताल जहां मेरिट के आधार पर एक पारदर्शी चयन प्रकिया के जरिये टीचर, डॉक्टर और अन्य स्टाफ चयनित होकर काम करने आते हैं, उन्हें प्रायवेट से ज़्यादा वेतन भी मिलता है किन्तु आज उनकी वो साख नहीं है जो प्रायवेट हास्पिटल, स्कूल कॉलेज की है। ग़रीब से ग़रीब आदमी भी अपना इलाज, बच्चों की पढ़ाई प्रायवेट में ज़्यादा फीस देकर कराना चाहता है। सरकारी इंस्टिट्यूशन उसकी अंतिम और विकल्पहीन प्राथमिकता होते हैं, चाहे वो खुद सरकारी कर्मचारी क्यों ना हो। अगर हम इसकी वजह गिनाने जायेंगे तो एक हजार एक कारण, बहाने, दोषारोपण में उलझकर रह जायेंगे.

हम यहाँ कुछ सकारात्मक पहल करने वालों की बात करने जा रहे हैं, जो यथास्थितिवादी नहीं हैं। जिन लोगों ने अपनी उपस्थिति और पहल से संस्थानों की जड़ता को तोड़ा और कुछ नया करने की कोशिश की, वह उन स्कूलों, कॉलेज, संस्थान में जाकर, वहाँ के लोगों से मिलकर महसूस की जा सकती है। यदि आप कभी छत्तीसगढ़ प्रशासन अकादमी निमोरा जाएं और वहाँ चल रही गतिविधियों को देखें तो आप ये महसूस कर सकते हैं कि यहां जो बदलाव पिछले डेढ़ दो साल में आये हैं, वह यहां की महानिदेशक श्रीमती रेणु जी.पिल्ले की वजह से है,जिन्होंने अपनी सकारात्मक सोच के जरिए यहां पर वो सब किया जो इसकी स्थापना के समय सोचा गया होगा।

छत्तीसगढ़ प्रशासन अकादमी में राज्य के नवागत और कार्यरत अधिकारियों का सतत प्रशिक्षण होता है। यह प्रशिक्षण उन्हें नियमन प्रकिया और संवेदनशीलता के साथ एक बेहतर अधिकारी के रूप में कार्य करने में मददगार साबित होता है। किसी भी सरकार में जैसा हमेशा से होता आया है कि कुछ पोस्टिंग को डंपिंग, वैटिंग पोस्टिंग के रूप में जाना जाता है। वैसी ही कुछ पोस्टिंग प्रशासन अकादमी की डायरेक्टर जनरल और डायरेक्टर की होती है। जिस वरिष्ठ या सरकार की आंखों में खटकने वाले अधिकारी को मंत्रालय से बाहर का रास्ता दिखाना होता है, उनके लिए राजस्व मंडल, माध्यमिक शिक्षा मंडल, प्रशासन अकादमी जैसी संस्थाएं हैं।

ज़्यादातर प्रशिक्षण संस्थान, आयोग अधिकारियों के डंपिंग यार्ड हैं। अपनी ईमानदारी और नियम प्रक्रिया का कड़ाई के साथ पालन कराने के कारण रेणु जी. पिल्ले कभी राजस्व मंडल बिलासपुर तो कभी प्रशासन अकादमी पदस्थ की जाती रही हैं। यदि ग़लती या विकल्पहीनता के अभाव में उन्हें उच्च शिक्षा विभाग का प्रभार दे भी दिया जाये तो तबादला प्रेशर में आई सरकार को उन्हें वहां से भी हटाना पड़ता है। बिलासपुर राजस्व मंडल की अपनी डंपिंग पोस्टिंग के बाद प्रशासन अकादमी की अपनी दूसरी डंपिंग पोस्टिंग में आई रेणु जी. पिल्ले किसी भी पोस्टिंग को डंपिंग नहीं मानती और यहां रहकर जो बेहतर कर सकती हैं, वो कर रही हैं। प्रशासन अकादमी में आपकी गुणवत्ता के साथ बेहतर प्रशिक्षण, नवाचार देखने को मिलेगा, वो शायद पहले कभी नही था। अपनी टीम लीडर के साथ यहां का सारा स्टाफ नवाचार, प्रशिक्षण कार्यक्रमों की संख्या, गुणवत्ता को बेहतर करने में दिन—रात लगा हुआ है। ये वही लोग हैं पर केवल नेतृत्व बदला है।

अब बात करते हैं डॉ. राधाबाई शासकीय नवीन कन्या महाविद्यालय पुरानी बस्ती की। कभी आपका जाना हो तो देख सकते हैं कि यहां की पूरी फिजा, तस्वीर बदली हुई है। एक बहुत ही साफ सुथरे, बेहतर शैक्षणिक अनुशासित वातावरण के साथ ये महाविद्यालय संचालित हो रहा है। और इसका श्रेय जाता है यहां के तीन दिन पहले तक प्राचार्य रही डॉ.अरूणा पल्टा को। जो अब स्व.हेमचंद यादव दुर्ग विश्वविद्यालय की कुलपति हैं। बेहतर स्वास्थ्य, सुरूचिपूर्ण और संतुलित खानपान की शिक्षा देने वाली होम सांइस की इस टीचर ने पूरे कालेज को अपनी सुरूचिपूर्ण पसंद की रेसीपी से बढ़िया जायक़ा दिया है।

रायपुर का बीटीआई ग्राउंड बहुतों को मेले ठेले, बाबाओं के प्रवचन, बड़े इंवेंट या सुबह की मार्निंग वाक के लिए याद होगा पर यहां अंदर एक सरकारी टीचर ट्रेनिंग संस्थान है जिसमें वर्तमान में शिक्षक के रूप में काम करने वाले और भविष्य में टीचर बनने का सपना देखने वाले लोग बीएड, एमएड करने आते हैं, दिनभर पढ़ते लिखते हैं। नवाचार करके नये संस्कार पाते हैं। यहां के प्रिंसिपल हैं डॉ.योगेश शिवहरे। डॉ शिवहरे ने अपनी पहल से यहां जो नवाचार प्रारंभ किया है, उसके दूरगामी परिणाम हमने शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षकों के माध्यम से देखने को मिलेंगे। बात थर्ड जेंडर को लेकर व्याप्त अवधारणा को बदलने की हो या फिर साल में एक बार होने वाली सोशल गेदरिंग की, यहां का समूचा नजारा और नजरिया बदला हुआ है।

कभी आप धमतरी रोड पर देवपुरी में बने शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में जायेंगे तो वहां की फिजां भी पिछले कुछ सालों में बदली -बदली नजर आयेगी। गणित के बेहतरीन टीचर रामनरेश त्रिवेदी ने अपने साथियों की मदद से इस  उपेक्षित से समझे जाने वाले स्कूल को मॉडल स्कूल में तब्दील कर दिया है। 2011 से पदस्थ प्राचार्य के रूप में पदस्थ गणित के टीचर आरएन त्रिवेदी की पहल से इस मिंटू शर्मा स्कूल को बेस्ट स्कूल का अवार्ड और सर्टिफिकेट मिला है। स्कूल के परिसर में बाग़वानी, सब्जी भाजी का उत्पादन देखते ही बनता है। भरवाडीह कला तिल्दा स्कूल के प्रधान पाठक दिनेश कुमार वर्मा ने भी अपने स्कूल की तस्वीर बदलकर इसे आदर्श विद्यालय बना दिया है।

मांढर गव्हर्मेंट स्कूल की प्रिंसिपल सरिता नासरे की लीडरशीप में इस स्कूल में पर्यावरण जागरूकता के साथ बहुत से नवाचार हुए हैं। अभनपुर के संकरी गाव के स्कूल में प्राचार्य चमेली वर्मा ने भी अपने स्कूल की तस्वीर बदली है।

संकरी स्कूल की प्रिंसिपल श्रीमती चमेली वर्मा का स्कूल स्मार्ट स्कूल प्रोजेक्ट में शमिल हुआ है। स्कूल में स्मार्ट क्लास, लायब्रेरी भी स्थापित की गई। कल्पतरु पॉवर कोरबा सीएसआर की राशि से स्कूल से 65 मिनी साइंस सेंटर स्थापित किये गये हैं। स्कूल में बहुत से नवाचार हुए हैं। ऐसे बहुत से प्रधानपाठक, प्राचार्य होेगे जिन्हें हो सकता है कि अभी तक शिक्षक दिवस पर किसी बड़े मंच ने सम्मानित ना किया हो, जिन्हें राजभवन जाने का अवसर नसीब नहीं हुआ हो, पर उनका काम सिर चढ़कर उनके विद्यार्थियों, अभिभावकों में बोलता होगा।

हम जिस समय में रह रहे हैं वहां जरूरी नहीं कि पात्र और गंभीर, जानकार लोग पुरस्कृत हों। यही हाल बहुत से बेहतरीन टीचर का है। ना तो इन्हें राज्य स्तरीय राज्यपाल पुरस्कार, ना ही राष्ट्रीय स्तर का राष्ट्रपति पुरस्कार मिला है। इन्हें पुरस्कार पाने के लिए लंबी चौड़ी फाईल बनवानी पड़ती है, अनुशंसा करवानी पड़ती है और बहुत से पापड़ बेलने पड़ते हैं जो इनके बूते की बात नहीं है सो ये अपने काम नेपथ्य से ही सही अपने छात्रों के दिलों में रहते हैं।

छत्तीसगढ़ का एजुकेशन हब समझे जाने वाले भिलाई को शैक्षिक नक़्शे में पहचान दिलाने में भिलाई स्टील अथारिटी की ओर से संचालित सेक्टर10, सेक्टर 4 स्कूल की अलग पहचान है। रायपुर में और आसपास में नौकरी करने वाले बहुत से लोग भिलाई में केवल इसलिए भी रहते रहे हैं कि वहां पढाई बहुत अच्छी होती है। प्रिंसिपल आर एन सिंह के साथ चांदवानी सर की मैथेमैटिक्स की क्लास, अमरेन्द्र शर्मा सर की फिजिक्स, राजेश शर्मा सर की केमिस्ट्री, बी एस आर्या सर की केमेस्ट्री, संतोष राय की कॉमर्स क्लास का अपना आकर्षण और सफलता की गारंटी भी है। रिसाली का डीपीएस स्कूल के तत्कालीन प्रिंसिपल का अनुशासन और सेक्टर 4 स्कूल के प्रिंसिपल एम .एम त्रिपाठी जैसे बहुत से लोगों की वजह से भिलाई ने अपना परचम पूरी दुनिया में फहराया है। आज इनमें से बहुत से टीचर अपने विद्यालय, कोचिंग क्लास चला रहे हैं जिसका अपना नाम है।

मैंने अपने इस लेख में कुछ नामों का उल्लेख किया। बहुत से नाम छूट गये होंगे। ऐसा अक्सर होता है। बस मैं देश के शीर्षस्थ कवि विनोद कुमार शुक्ल की कविता के जरिये यही कहना चाहता हूँ-


कोई अधूरा पूरा नहीं होता


कोई अधूरा पूरा नहीं होता

और एक नया शुरू होकर

नया अधूरा छूट जाता है

शुरू से इतने सारे

कि गिने जाने पर भी अधूरे छूट जाते हैं


परंतु, इस असमाप्त

अधूरे से भरे जीवन को

पूरा माना जाए, अधूरा नहीं

कि जीवन को भरपूर जिया गया


इस भरपूर जीवन में

मृत्यु के ठीक पहले भी मैं

एक नई कविता शुरू कर सकता हूं

मृत्यु के बहुत पहले की कविता की तरह

जीवन की अपनी पहली कविता की तरह


किसी नए अधूरे को अंतिम न माना जाए.


(लेखक दैनिक आज की जनधारा समाचार—पत्र एवं एकेजे वेब मीडिया हाउस के प्रधान संपादक हैं)