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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-प्रशासनिक फेरबदल के मायने

 प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-प्रशासनिक फेरबदल के मायने

जब सरकारें बदलती हैं तो लोगों को लगता है कि पिछली सरकार की तुलना में आने वाली सरकार बेहतर होगी। जिन कारणों से पिछली सरकार को जनता ने खारिज करके नई सरकार को चुना है, शायद अब उन कारणों, समस्याओं से निजात मिलेगी। राजनीतिक उठापटक और सत्ता के खेल के कारण अब जनता किसी की भी पार्टी के लोगों को चुने, राजनीति के चतुर खिलाड़ी ऐन-केन प्रकारेण अपनी सरकार बना लेते हैं। पिछले सालों में हमने ये खेल कई राज्यों में देखा है। ऐसे खेल करने वालों को लोग अब बुरा भी नहीं रखते। ये राजनीति के चतुर खिलाड़ी, चाणक्य की उपाधि से नवाजे जाते हैं। अब राजनीति दल चुनाव के बाद ईवीएम मशीन पर दोषारोपण करते हैं तो जनता में से आवाज आती है, हमने वोट तो किसी और पार्टी को देकर जीताया था पर सरकार तो किसी और पार्टी की ही बन गई। अब बैलेट पेपर नहीं विधायक ही बदल जाते हैं। प्यार और जंग में सब कुछ जायज है, ऐसा कहा जाता है किन्तु राजनीति में कुछ भी नाजायज नहीं है। जनता जिसे चुनती है वह सरकार नहीं बन पाती। जनता की चुनी हुई कोई सरकार नहीं बनकर और कोई सरकार बन जाती है तो सत्ता जनता को ही बदलने में लग जाती है। ऐसे में बर्तोल्त ब्रेख्त की एक कविता याद आती है-
अखबार का हॉकर चिल्ला रहा था कि जनता ने सरकार का विश्वास खो दिया है अब सरकार को चाहिए कि वह इस जनता को खारिज कर
 अपने लिए नई जनता चुन ले।


सत्ता बदलने के साथ सबसे पहले यदि कहीं फेरबदल होता है तो वह है ब्यूरोक्रेसी में। सरकारें तबादले के जरिये अपने नये निजाम होने का अहसास कराती है। अधिकांश राज्यों में मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक, वन विभाग के प्रमुख और ऐसे ही कुछ शीर्ष पदों पर काबिज लोगों को हटाकर पूरे राज्य की नौकरशाही को यह संदेश दिया जाता है कि अब हम आ गये हैं। अपने काम में निपुण नौकरशाही इस तरह के फेरबदल की अभ्यस्त हो जाती है। चतुर नौकरशाह समय के साथ अपनी गोटी फीट कर लेते हैं। अधिकारियों की अलग-अलग विभागों, पदों पर पदस्थापना के आधार पर लोगों को पता चल जाता है कि सरकार के चहेते अधिकारी कौन हैं। चतुर अधिकारी अपने इस लोक के साथ-साथ अपने परलोक यानी सेवानिवृत्ति के बाद व्यवस्थापन की व्यवस्था कर लेते हैं। पिछले दो सालों में बहुत बार परिवर्तन हुए हैं। इन परिवर्तन वे ही याद रहते हैं, या याद आते हैं जिन्होंने कुछ बेहतर किया हो या कोई गुल खिलाया हो। वरना लगभग तो साल भर से सब कोरोनटाइन  होकर अपने अपने कमरों में अकेले ही बैठे हुए हैं। जनता और पत्रकार को मंत्रालय में बैठे अफसरशाही के दीदार के इजाजत भी नहीं है।
छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद माटीपुत्रों की पहचान कर उनकी सेवाएं लेने का सिलसिला मुख्य सचिव के पद पर विवेक ढांढ के साथ शुरू हुआ। उसके बाद माटीपुत्र के रुप में अजय सिंह को चीफ सेक्रेटरी बनाया गया किंतु उन्हें बीच में ही राजस्व मंडल का अध्यक्ष बनाकर बिलासपुर भेज दिया गया। अब उन्हें छत्तीसगढ़ राज्य योजना आयोग का उपाध्यक्ष बनाया गया। आर.पी. मंडल मुख्य सचिव के पद पर काबिज हुए अब उनकी सेवानिवृत्ति के बाद अमिताभ जैन मुख्य सचिव बनाये गये हैं, जो छत्तीसगढ़ की माटी के पुत्र हैं। परपंरा अनुसार आर पी मंडल के पुर्नवास करते हुए उन्हें एनआरडीए का चेयरमैन बना दिया गया है।

छत्तीसगढ़ की ब्यूरोक्रेसी के शीर्ष पदों पर काबिज अधिकांश लोगों ने अपने कामकाज से ऐसी कोई खास छाप नहीं छोड़ी है जिसके लिए उन्हें याद किया जाये। बहादुर शाह जफर का एक शेर है-
 उम्र-ए-दराज़ मांग के लाई थी चार दिन 
दो आरज़ू में कट गए दो इंतिज़ार में

पहले चीफ सेक्रेटरी अरुण कुमार से लेकर अधिकांश चीफ सेक्रेटरी सेवानिवृत्ति के बाद भी राज्य की सेवा के लिए तत्पर रहे। जिन्हें मौका नहीं मिला ,उनका तादाम्त्य सरकार से ठीक से स्थापित नहीं हो पाया। वरना तो एक सेवानिवृत्त मुख्य सचिव ने कैबिनेट मंत्री तक का दर्जा हासिल किया। वे दिल्ली से बैठकर पूरी ईमानदारी और निष्ठा के साथ राज्य की सेवा करते रहे।
इसके बाद बात ,छत्तीसगढ़ के नये मुख्य सचिव अमिताभ जैन की जाये। बहुत ही सौम्य, साफ-सुथरी छवि के, मृदुभाषी, कम बोलने वाले अमिताभ जैन, अमिताभ बच्चन की तरह एंग्रीयंग मैन की छवि नहीं रखते। वे बहुत ही शांत भाव से अपने काम में लगे दिखते हैं ।उन्हें देखकर ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर वाली कहावत याद आती है। भारतीय प्रशासनिक सेवा के 1989 बैच के अमिताभ जैन ने दल्लीराजहरा में स्कूली शिक्षा प्राप्त की। मैकेनिकल इंजीनियरिंग में एम.टेक करने वाले अमिताभ जैन ने अविभाजित मध्यप्रदेश में 11वीं बोर्ड की परीक्षा में टॉप किया था। अमिताभ जैन नए छत्तीसगढ़ के 12वें चीफ सेक्रेटरी के रुप में अपने दायित्व का निर्वाहन करेंगे। उनके कामकाज को देखते हुए भूपेश बघेल ने उन्हें वित्त विभाग के प्रभार पर यथावत रखा। लंबे समय से फाइनेंस की जिम्मेदारी संभालने वाले अमिताभ जैन ने वाणिज्यिक कर, गृह, जेल, परिववहन, जल संसाधन जैसे विभागों का दायित्व संभाला। वे कभी भी किसी कंटोवर्सी में नहीं उलझे।

खरगोश और कछुए की दौड़ वाली कहानी जो कि ब्यूरोक्रेसी में भी संदर्भ विशेष में सुनाई जाती है। उसमें बहुत धीरे-धीरे इत्मीनान से कछुआ गति से निरंतर चलने वाले अमिताभ जैन ने बहुत से खरगोशों को पीछे छोड़ा है। अपनी कम उम्र के कारण वे लंबे सयम तक यानी जून 2025 में रिटायर होंगे। इस बीच विधानसभा चुनाव होंगे। राज्य की इंद्रावती, महानदी से बहुत सा पानी बहेगा। जो पीछे हैं वे आगे आने की कोशिश करेंगे। जो लोग सत्ता के सूत्रों का संचालन नेपथ्य में रहकर करना चाहते हैं। वे भी इस माटी पुत्र को अपनी कसौटी पर परखेंगे। बहरहाल अमिताभ जैन को बहुत-बहुत बधाई। उम्मीद की जा सकती है कि वे अपनी लंबी पारी में ऐसा कुछ करने की कोशिश करेगे, जिससे छत्तीसगढ़ महतारी के नाम पर चार चांद लगे। यह सही है कि अकेला चीफ सेक्रेटरी चाहे भी तो बहुत कुछ नहीं कर पाता क्योंकि उसे सत्ता के इशारों और आदेशों को समझकर काम करना होता है। सत्ता किसी की भी हो वह बहुत क्रूर और निर्दयी होती है। सत्ता का नौकरशाही के लिए सूत्र वाक्य है “नौकरी में ना करि तो नौकरी फिर का करि।।

अमिताभ जैन बहुत सुलझे हुए नौकरशाह हैं जिन्होंने फाइनेंस डिपार्टमेंट में रहकर बहुत बार ना की है। वे जानते हैं कि कभी हां, कभी ना से भी काम चल सकता है।  
फिर भी हम दुष्यंत कुमार के शब्दों में उनसे कह ही सकते हैं-
कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता 
एक पत्थर तो तबीअज्त से उछालो यारो