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"हत्या एक आकार की" नाटक का मंचन लगातार दो दिन

पहले दिन पं. दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरिम तथा दूसरे दिन वृंदावन हाल में

रायपुर, 12 जनवरी। बीथ्रिंग स्पेस जयपुर द्वारा अभिषेक एवं स्वप्निल के निर्देशन में तैयार नाटक "हत्या एक आकार की" का मंचन अजीम प्रेमजी फाउंडेशन की ओर से छत्तीसगढ़ विजुअल आर्ट सोसायटी रायपुर के सहयोग से 13 जनवरी और 14 जनवरी को रायपुर में किया जा रहा है। पहले दिन की नाट्य प्रस्तुति रात्रि 8 बजे पं. दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरिम तथा दूसरे दिन की नाट्य प्रस्तुति 14 जनवरी को शाम 7 बजे वृंदावन हाल सिविल लाइन रायपुर में की जाएगी। नाटक में प्रवेश के लिए किसी प्रकार का कोई शुल्क नहीं है। 

नाट्य प्रस्तुति के संबंध में जानकारी देते हुए श्री सुभाष मिश्र ने बताया कि ललित सहगल के नाटक ”हत्या एक आकार की” का, जो उन्होंने शायद गाँधी जन्म-शताब्दी के बरस 1969 में या उसके दो-एक साल बाद लिखा था। इस पर एक इंग्लिश फ़िल्म भी बनी थी, ‘एट फ़ाइव पास्ट फ़ाइव’। 1969 में लिखे इस नाटक की प्रस्तुति हमारे समय के सवालों को ऐसे समेटती है मानो गांधी जी के जन्म के डेढ़ सौवें साल में हम उन्हें फिर उन्हीं सवालों के कटघरे में खड़े कर रहे हैं, और सच से नावाकिफ ही रहना चाहते हैं, अपनी कमजोरियों से घबराकर। नाटक में गांधी जी का तर्क रख रहा पात्र कहता है 'ये एक आकार की हत्या है' जो बार बार होती है। नाटक स्वतंत्रता संग्राम में अपने प्राणों की आहुति देने वाले क्रांतिकारियों, तत्कालीन राष्ट्रीय संगठन और महात्मा गांधी के विचारों का सम्यक विवेचन है। 


किसी ने प्रगतिशील लोकतांत्रिक समाज के निर्माण के लिए यह जरूरी है कि लोगों को अपनी बात कहने की आजादी हो और मैं आपसे प्रेम, सौहार्द और शांति जैसे मूल्यों के प्रति आस्था हो। समाज की संस्कृति में विश्वास विश्वास हो एक-दूसरे के विचार से सहमत या असहमत होने की स्वतंत्रता हो। इस तरह की मूल्यों के बिना एक अच्छे समाज या राष्ट्र की कल्पना भी बेमानी हैं। बीथ्रिंग स्पेस जयपुर के युवा साथी ऐसी ही विचारों के धागों से बुना नाटक "हत्या एक आकार की" लेकर हमारे बीच आ रहे हैं। 

नाटक में चार लोग हैं, जो 'उस' की हत्या करना चाहते हैं, जिसके सत्य, अहिंसा और सांप्रदायिक सद्भाव के 'फ़ालतू', बल्कि 'ख़तरनाक' नारों ने हिन्दू राष्ट्र को कमज़ोर कर दिया है, जो 'क्रांतिकारियों' की आलोचना करता रहा है; जिसने मौत के डर पर विजय पा ली है, जनता पर ऐसा जादू कर दिया है कि उसे जान से मार कर ही चुप किया जा सकता है। ये चारों लोग अपने मिशन पर निकलने ही वाले हैं कि उनमें से एक को संदेह होने लगता है कि मिशन सही है या ग़लत? उसे मनाने की तमाम कोशिशें नाकाम हैं क्योंकि वह चाहता है कि किसी को प्राणदंड देने के पहले अपराध और दंड पर गंभीर विचार हो। आख़िरकार तय होता है कि एक मुक़दमे का अभिनय किया जाए। जिसे संदेह है, वह 'उस अभियुक्त' के वकील की भूमिका करे, जिसे गोली चलानी है वह 'सरकारी वकील' की, तीसरा साथी जज बने, और चौथा बाक़ी बचे सारे रोल निभाए।