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हिंदी के महान कवि संत सूरदास का जन्म : रामदास सूत सूरदास ने, जन्म रुनकता में पाया!

हिंदी के महान कवि संत सूरदास का जन्म :  रामदास सूत सूरदास ने, जन्म रुनकता में पाया!


सूरदास जी के जन्म और स्थान को लेकर एक पद्द के माध्यम से बताया गया है-रामदास सूत सूरदास ने, जन्म रुनकता में पाया! गुरु बल्लभ उपदेश ग्रहण कर, कृष्णभक्ति सागर लहराया!!

सूरदास 15 वी शताब्दी के अंधे संत, कवी और संगीतकार थे। सूरदास का नाम भक्ति की धारा को प्रवाहित करने वाले भक्त कवियों में सर्वोपरि है। सूरदास अपने भगवान कृष्ण पर लिखी भक्ति गीतों के लिये जाने जाते है। सूरदास जी की रचनाओं में भगवान श्री कृष्ण के भाव स्पष्ट देखने को मिलते हैं। जो भी उनकी रचनाओं को पढ़ता है वो कृष्ण की भक्ति में डूब जाता है। 

उन्होंने अपनी रचनाओं में भगवान श्री कृष्ण का श्रृंगार और शांत रस में दिल को छू जाने वाला मार्मिक वर्णन किया हैं। सूरदास जी, को हिन्दी साहित्य की अच्छी जानकारी थी, अर्थात उन्हें हिन्दी साहित्य का विद्धान माना जाता था।

महान कवि सूरदास जी के जन्म के बारे में कोई पुख्ता प्रमाण तो नहीं मिलता है। हिन्दी साहित्य में इनके जन्म को लेकर साहित्यकारों के अलग-अलग मत है। हालांकि कई ग्रंथों से प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर माना जाता है कि सूरदास जी का जन्म साल 1535 में रुनकता नामक गांव में हुआ था। वहीं आज के समय में यह गांव मथुरा-आगरा मार्ग के किनारे स्थित है। इनके जन्म और स्थान को लेकर एक पद्द के माध्यम से बताया गया है।

“रामदास सूत सूरदास ने, जन्म रुनकता में पाया!

गुरु बल्लभ उपदेश ग्रहण कर , कृष्णभक्ति सागर लहराया!!”

भक्तिकाल के महान कवि सूरदास जी के पिता का नाम रामदास था, जो कि एक महान गीतकार थे। आपको बता दें कि महान कवि सूरदास के जन्म से अन्धे होने के बारे में अलग-अलग तरह के मतभेद हैं। उनके जन्मांध होने का कोई प्रमाणिक साक्ष्य नहीं है, जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि वे जन्म से ही अंधे थे।

सूरदास जी शुरु से ही भगवद भक्ति में लीन रहते थे। उन्होनें खुद को पूरी तरह से श्री कृष्ण भक्ति में समर्पित कर दिया था। कृष्णभक्ति में पूरी तरह डूबने के लिए कवि ने महज 6 साल की उम्र में अपनी पिता की आज्ञा से घर छोड़ दिया था। इसके बाद वे यमुना तट के गौउघाट पर रहने लगे थे।

एक बार जब सूरदास जी अपनी वृन्दावन धाम की यात्रा के लिए निकले तो इस दौरान इनकी मुलाकात बल्लभाचार्य से हुई। जिसके बाद वह उनके शिष्य बन गए। बल्लभाचार्य से ही भक्ति की दीक्षा प्राप्त की। श्री वल्लभाचार्य ने सूरदास जी को सही मार्गदर्शन देकर श्री कृष्ण भक्ति के लिए प्रेरित किया।

भक्तिकाल के सर्वश्रेष्ठ कवि सूरदास को हिन्दी साहित्य का विद्धान कहा जाता था। सूरदास जी की रचनाओं में श्री कृष्ण के प्रति अटूट प्रेम और भक्ति का वर्णन मिलता है। आपको बता दें कि सूरदास जी ने अपनी रचनाओं में वात्सल्य रस, शांत रस, और श्रंगार रस को अपनाया था। सूरदास जी ने अपनी कल्पना के माध्यम से श्री कृष्ण के अदभुत बाल्य स्वरूप, उनके सुंदर रुप, उनकी दिव्यता वर्णन किया है। इसके अलावा सूरदास ने भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं का भी वर्णन किया है।

सूरदास जी की रचनाओं में श्री कृष्ण के प्रति गहरा भाव देखने को मिलता है, जो कि बेहद लुभावनी है। इसके अलावा यशोदा मैया के पात्र के शील गुण पर सूरदास जी द्धारा लिखे चित्रण काफी सराहनीय है। सूरदास जी की कविताओं में पूर्व कालीन आख्यान, और ऐतिहासिक स्थानों का भी वर्णन किया गया है।

सूरदास जी द्वारा लिखित 5 ग्रन्थ बताएं जाते हैं। जिनमें से सूर सागर, सूर सारावली और साहित्य लहरी, नल-दमयन्ती और ब्याहलो के प्रमाण मिलते हैं। सूरसागर में करीब एक लाख पद होने की बात कही जाती है। लेकिन वर्तमान संस्करणों में करीब 5 हजार पद ही मिलते हैं। सूर सारावली में 1107 छन्द हैं।

सूरदास जी के जन्म की तरह मृत्यु के बारे में भी कई मतभेद है। सूरदास जी ने भक्ति के मार्ग को ही अपनाया। सूरदास जी ने अपने जीवन के आखिरी पल ब्रज में गुजारे। कई विद्धानों के मुताबिक सूर का निधन 1642 में हुआ था। इस तरह महान कवि सूरदास जी का पूरा जीवन श्री कृष्ण की भक्ति को समर्पित था। (संकलित)

मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो 


मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो |

भोर भयो गैयन के पाछे, मधुवन मोहिं पठायो ।

चार पहर बंसीबट भटक्यो, साँझ परे घर आयो ॥


मैं बालक बहिंयन को छोटो, छींको किहि बिधि पायो ।

ग्वाल बाल सब बैर परे हैं, बरबस मुख लपटायो ॥


तू जननी मन की अति भोरी, इनके कहे पतिआयो ।

जिय तेरे कछु भेद उपजि है, जानि परायो जायो ॥


यह लै अपनी लकुटि कमरिया, बहुतहिं नाच नचायो ।

'सूरदास' तब बिहँसि जसोदा, लै उर कंठ लगायो ॥