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II छत्तीस घाट : नीति आयोग का ये कौन सा नवाचार है ! संपादक अनिल द्विवेदी समझा रहे हैं कि गोठान या धान खरीदी नवाचार क्यों नही हो सकती.

II छत्तीस घाट : नीति आयोग का ये कौन सा नवाचार है ! संपादक अनिल द्विवेदी समझा रहे हैं कि गोठान या धान खरीदी नवाचार क्यों नही हो सकती.

अनिल द्विवेदी

नागहां पहली बार नीति आयोग ने इंस्टीटयूट फार काम्पिटिटवनेस के साथ मिलकर भारत नवाचार सूचकांक यानि इनोवेशन इंडेक्स रिपोर्ट 2019 जारी की है. यह खबर आई और चली गई, पर अमूमन ब्रेकिंग न्यूज के लिए टूट पड़ने वाले राज्य के मीडिया हाउसों ने संभवत: इसे निगेटिव खबर मानकर मुंह मोड़ लिया. लेकिन हमने यानि कि 'आज की जनधारा' ने न्यायवादी दृष्टिकोण के साथ इसे पहले पन्ने पर प्रकाशित किया है.

रिपोर्ट कहती है कि नवाचार करने की क्षमता और प्रदर्शन के मामले में कर्नाटका, तमिलनाडु और महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्य क्रमानुसार सबसे आगे रहे जबकि छोटे राज्यों में सिक्किम ने बाजी मारी है. कुल 17 राज्यों की रेटिंग हुईं जिसमें छत्तीसगढ़ नीचे से तीसरा यानि पन्द्रहवें नम्बर पर है. नवाचार का मतलब होता है नई पहल. इनोवेशन में निवेशक, शोधकर्ता और आविष्कारक सभी को एक मंच मिलता है. आसान-सी समझ है कि राज्यों को जिन पैमानों पर कसा गया, उनमें मानव संसाधन, निवेश, कारोबार का माहौल, सुरक्षा और कानूनी वातावरण को रखा गया था. वहीं ज्ञान के उत्पादन और ज्ञान के प्रसार को प्रदर्शन के पैमानों में शामिल किया गया.



आयोग की यह रिपोर्ट हमारे दर्जनों प्रश्नों से टकरा रही है. गुजरे 15 सालों तक छत्तीसगढ़िया यदि देश में सबले बढ़िया रहा है तो यह रिपोर्ट थोड़ा चिंतित अवश्य करती है. सब जानते हैं कि पिछली सरकार की योजनाएं देशभर में आदर्शमयी साबित हुई थीं जिसने दो दर्जन से ज्यादा राष्ट्रीय अवॉर्ड दिलाए थे. कुल मिलाकर राष्ट्रीय क्षितिज पर हमन अव्वल थे. फिर महज नौ महीने में ही ऐसा क्या हो गया कि छत्तीसगढ़ नवाचार के मामले में फिसडडी हो गया. आप इस बात पर ठंडा आश्चर्य प्रगट कर सकते हैं कि प्रदेश में कांग्रेस सरकार है और केन्द्र में भाजपा इसलिए रिपोर्ट के साथ न्याय नही हो सका. या हो सकता है कि छत्तीसगढ़ की नौकरशाही ने असहयोग के जो मरूस्थल बनाए होंगे, उससे सरकार के नवाचार आयोग तक ना पहुंच सके हों और भूपेश बघेल सरकार के नवाचार, रेटिंग ना पा सके हों.

नवाचार सूचकांक के जरिये राज्यों का मजबूत और कमजोर पक्ष सामने आया है, इससे जरूरत के मुताबिक नीति बनाने में मदद तो मिलेगी परंतु जो सच है, उससे मुंह कैसे मोड़ सकते हैं! ब्रहम—जिज्ञासा यह है कि बिहार का पढ़ाई—मॉडल, उत्तराखण्ड का सिंगल विंडो सिस्टम, पुणे की शिक्षा, बेंगलुरू की इंजीनियरिंग, कोटा के कोचिंग सेंटर, हैदराबाद का आईटी हब और नोएडा का मोबाइल हब, नवाचार की श्रेणी में रखे जा सकते हैं तो छत्तीसगढ़ का गोठान, किसानों की ऋृण माफी या दाना—दाना धान खरीदी, इस सूची में जगह क्यों नही पा सका. हमने तो गोबर को भी 'सोना' बना दिया है.

अगर यह तर्क, नीति आयोग का अपमान नही है तो कह दूं कि रिपोर्ट सरासर जल्दबाजी में तैयार की गई है, अन्यायपरक है. अपन मानना हे के आईना देखते रहना चाहिए. जरूरी लगे तो दिखाना भी चाहिए. जिन बड़े राज्यों को नवाचार में आगे बताया गया है, वहां अन्नदाता की हालत कितनी दयनीय है, देश भलीभांति देख—सुन चुका है. छत्तीसगढ़ में ही पिछले 15 सालों में क्या हुआ, यहां के प्राकृतिक संसाधन पूंजी—चमत्कार के आरे में चिरते चले गए.

इस बार सरकार बदली तो न्याय मिलना शुरू हुआ. जिन कारपोरेट ने किसानों की जमीनें हड़पीं या प्राकृति संसाधनों को जबरिया कब्जाया, कांग्रेस सरकार न्याय करते हुए उनकी जमीनें वापस लौटा रही है. किसानों का 32 हजार करोड़ की ऋण माफी, किसानों की फसल का दाना—दाना खरीदना या फिर गौठान पर जोर देते हुए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को संजीवनी प्रदान करना, ऐसा नवाचार तो किसी भी सरकार के नवाचारों पर भारी पड़ता है. देश के बजट का 64 प्रतिशत तो कृषि और किसानों पर ही खर्च हो रहा है. इसलिए छत्तीसगढ़ इस रिपोर्ट को खारिज कर सकता है! अंग्रेजीराज में हंटर कमीशन की रिपोर्ट खारिज कर सकते हैं तो नीति आयोग की क्यों नहीं.!

( लेखक दैनिक आज की जनधारा और AKJ वेब पोर्टल के संपादक हैं )