आइएएस बने बगैर नौ केन्द्र सरकार में बने संयुक्त सचिव, मोदी सरकार का नया प्रयोग, रमन सरकार का प्रयोग फलॉप रहा था!

आइएएस बने बगैर नौ केन्द्र सरकार में बने संयुक्त सचिव, मोदी सरकार का नया प्रयोग, रमन सरकार का प्रयोग फलॉप रहा था!

नोएडा. यूपीएससी ने सीधी भर्ती व्यवस्था के तहत पहली बार ज्वाइंट सेक्रेटरी पद के लिए प्राइवेट क्षेत्र से जिन 9 एक्सपर्ट्स को चुना हैं उनमें से एक व्यक्ति अभिनेता मनोज बाजपेयी के भाई भी हैं। अभिनेता मनोज बाजपेयी के छोटे भाई सुजीत कुमार बाजपेयी को मिनिस्ट्री ऑफ एनवॉयरमेंट, फॉरेस्ट और क्लाइमेट चेंज का ज्वॉइंट सेक्रेटरी बनाया गया है। सरकार में ज्वॉइंट सेक्रेटरी वह पद है जिस पर पहुंचने के लिए यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा पास कर IAS अफसर बने लोगों को कई कई साल लग जाते हैं।

न्यूज एजेंसी की खबर के मुताबिक मनोज ने इस सिलसिले में बात करते हुए कहा, हम बेहद खुश हैं और सुजीत पर गर्व महसूस कर रहे हैं। हमें पहले से पता था कि सुजीत बहुत मेहनती और ईमानदार शख्स है। वो अपनी ड्यूटी के प्रति बेहद वफादार है और यही कारण है कि उसकी उन्नति देखकर मुझे जरा भी हैरानी नहीं हो रही है। हम छह भाई हैं और हम सभी अपने छोटे भाई की सफलता से बेहद खुश हैं।

गौरतलब है कि कार्मिक मंत्रालय ने पिछले साल जून में 'सीधी भर्ती व्यवस्था के जरिए संयुक्त सचिव रैंक के पदों के लिए आवेदन आमंत्रित किए थे। इन पदों के लिए आवेदन करने की अंतिम तिथि 30 जुलाई 2018 थी। इससे संबंधित सरकारी विज्ञापन सामने आने के बाद कुल 6,077 लोगों ने आवेदन किए थे।

जिन नौ लोगों को नियुक्ति् दी गई है, उनकी सूची और विभाग इस प्रकार है :

1)अम्बर दुबे, संयुक्त सचिव, नागरी उड्डयन
2)अरूण गोयल, संयुक्त सचिव, वाणिज्य
3)राजीव सक्सेना, संयुक्त सचिव, आर्थिक मामले
4)सुजितकुमार बाजपेई, संयुक्त सचिव, पर्यावरण व जलवायु परीवर्तन
5)सौरभ मिश्रा, संयुक्त सचिव, वित्तीय सेवा
6)दिनेश जगदाल, संयुक्त सचिव, नविनीकरण उर्जा
7)सुमन प्रसाद सिंह, संयुक्त सचिव, सडक राजमार्ग
8)भुषण कुमार, संयुक्त सचिव, जहाजरानी
9)कोकोली घोष, संयुक्त सचिव, किसान कल्याण


रमन सरकार का प्रयोग फलॉप रहा था

आपको याद दिला दें कि इसी तरह का प्रयोग छत्तीसगढ़ की रमन सरकार ने भी किया था. कुछ चुनिंदा विभागों में प्राइवेट सेक्टर से सीईओ और अन्य पदों पर लगभग 72 युवाओं को संविदा नियुक्ति दी गई थी. जिनका वेतन एक लाख रूपये महीना था. इनकी नियुक्ति का उददेश्य यह था कि विभागों की कार्यशैली में गुणवत्ता, सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन तथा कलेक्टर एसपी के साथ कोआरडिनेशन करना था. हालांकि ये लोग सरकार पर सफेद हाथी साबित हुए थे. दो—तीन साल तक काम करने के बाद जब रमन सरकार विदा हो गई तो इन लोगों को भूपेश बघेल सरकार ने निकाल दिया था. आश्चर्य कि इन युवाओं के वेतन पर सरकार को करोड़ों की चपत लगी थी तथा चयनितों में बहुत से भाजपा—आरएसएस के रिश्तेदार भी थे.