कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः प्रशान्त मन में सुखान्त

कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः प्रशान्त मन में सुखान्त

उग आयी है घास

तिनका-तिनका कितने पास

खगकुल का पूरा आकाश

फैली बहुरंगी उजास


किरनों के ताने-बाने पर

धूप की चादर बुने प्रकाश

झाँक रहे हैं फटे हुए बादल से

सतरंगे उजले रूमाल

नीकी-नीकी नैया डोले ताल


सागर में उठ कर ज्वार

उसी में शान्त

जैसे कोई

बहुत बड़ा मन हो प्रशान्त


यह कैसा तापमान

घट रहा जीवन का मान

जा रही जान बिना पहचान

दया में बसे हुए हैं प्रान


जन्म में बसी हुई है दया

दया में मन प्रशान्त

प्रशान्त मन में सुखान्त

अशान्त मन में दुखान्त