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बिन निज भाषा ज्ञान के

बिन निज भाषा ज्ञान के

जीतेश्वरी

आधुनिक हिंदी साहित्य के निर्माता और 19वी शताब्दी के हिंदी के प्रारम्भिक रचनाकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने निज भाषा ( हिंदी) के महत्व को रेखांकित करते हुए सन् 1880 के आस पास ही यह लिख दिया था ’निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल, बिन निज भाषा ज्ञान के मिटै न हिय को शूल’। 

सन् 2011 की जनगणना के अनुसार 41.03 प्रतिशत लोगों ने स्वीकार किया था कि हिंदी उनकी मातृभाषा है। हिंदी को अपनी दूसरी भाषा के तौर पर इस्तेमाल करने वाले देश के अन्य भारतीयों को शामिल किया जाए तो देश के लगभग 75 प्रतिशत लोग हिंदी बोलते हंै। भारत में 75 प्रतिशत हिंदी भाषियों सहित पूरी दुनिया में तकरीबन 80 प्रतिशत लोग आज हिंदी बोलते और समझते हंै। विश्व बाजार में हिंदी ग्राहकों को लुभाने की सबसे लोकप्रिय भाषा है। हर उत्पादक अपने माल को ग्राहकों के बीच लोकप्रिय बनाने के लिए हिंदी भाषा को ही सर्वथा उपयुक्त मानता है। हिंदी एक बहुत बड़े बाजार की भाषा बन चुकी है। हिंदी में प्रकाशित होने वाले समाचार पत्रों की प्रसार संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है जो कि सुखद है। नए-नए दैनिक समाचार पत्र और पत्रिकाओं के प्रकाशन में भी वृध्दि होती जा रही है।  

आज हिंदी सिनेमा देश का समूचा व्यवसाय हिंदी भाषा की नींव पर ही खड़ा हुआ है। हिंदी सिनेमा और हिंदी गीत संगीत पूरी दुनिया भर में लोकप्रिय हैं। यह सब हिंदी के उज्ज्वल प़क्ष को प्रदर्शित करता है और 14सितम्बर हिंदी दिवस के अवसर पर हमें गदगद भी करता है। 

इसके उलट हिंदी भाषा का एक श्यामल पक्ष भी है जिस पर आज अधिक विचार करने की आवश्यकता है। क्या कारण है कि जिस हिंदी को 14 सितम्बर 1949 के दिन संवैधानिक रूप से राजभाषा घोषित किया गया, जिसके फलस्वरूप प्रतिवर्ष 14 सितम्बर को पूरे देश में जोर-शोर से हिंदी दिवस का आयोजन किया जाता है, क्या आज वह उस सम्मान से वंचित है जिस सम्मान की वह अधिकारिणी है? 

दुर्भाग्यजनक यह है कि आज हिंदी विद्यालय या तो बंद हो रहे हंै या फिर छात्रों की संख्या में निरंतर गिरावट आ रही है। इसके विपरित अंग्रेजी माध्यमों के स्कूलों की संख्या आज तेजी से बढ़ती जा रही है। स्थिति यह है कि नगरों से लेकर ग्रामों तक अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की बाढ़ सी आ गयी है। हर माता पिता अपने बच्चों को सजा सवांरकर और टाई पहनाकर बसों या आटो रिक्शा से स्कूल रवाना करते हुए एक ही सपना देख रहा होता है कि अब उसके बेटे या बेटी को कोई बड़ा अफसर बनने से कोई रोक नहीं सकता है।  

संघ लोक सेवा आयोग की कोई प्रतियोगी परीक्षा हो या कर्मचारी चयन आयोग, रेलवे बोर्ड जैसी कोई प्रतियोगी परीक्षा हो, सबके लिए अंग्रेजी ज्ञान अनिवार्य है। तभी तो ये साहब बनकर, टाई सूट पहनकर और अंग्रेजी में सभी नागरिकों पर रौब गालिब करने में कामयाब हो सकेंगे। दुखद है कि स्वतंत्रता के 73वें वर्ष में प्रवेश करने के पश्चात् भी आज भी सारे सरकारी कामकाज अंग्रेजी में ही सम्पन्न होते हंै। अटल बिहारी वाजपेयी ने कभी संयुक्त राष्ट्र संघ में जो हिंदी में भाषण दिया था उसकी दुहाई दे दे कर हम कब तक अपनी गाल फूलाते रहेंगे। आज हिंदी दिवस के अवसर पर हमें अपने गिरहबान में झांककर देखने की जरूरत है। दुकानों के सामने लगने वाली पटिट्काओं से लेकर हमारे घरों के सामने लगने वाली नाम पटिट्काओं और यहां तक कि हमारे हस्ताक्षर भी हिंदी की जगह अंग्रेजी में होते हंै। 

जो राष्ट्र अपनी भाषा से प्रेम नहीं करता है, वह राष्ट्र महान राष्ट्र कैसे बन सकता है? जो नागरिक अपनी भाषा से मोहब्बत नहीं करता है वह सच्चा देश भक्त भी कैसे हो सकता है? महात्मा गांधी के इस कथन को बार-बार याद किए जाने की आवश्यकता है- ’हिंदी ही हिन्दूस्तान के शिक्षित समुदाय की सामान्य भाषा हो सकती है यह बात निर्विवाद सिध्द है। जिस स्थान को अंग्रेजी भाषा आजकल लेने का प्रयत्न कर रही है और जिसे लेना उसके लिए असंभव है, वही स्थान हिंदी को मिलना चाहिए क्योंकि हिंदी का उस पर पूर्ण अधिकार है यह स्थान अंग्रेजी को नहीं मिल सकता क्योंकि वह विदेशी भाषा है और हमारे लिए बड़ी कठिन है’। 

14वी शताब्दी के जिस महान भारतीय शायर अमीर खुसरो ने हिंदी या हिंदवी के सम्बंध में जो कहा था उस पर भी आज हिंदी दिवस के अवसर पर पूनर्विचार किए जाने की आवश्यकता है। अमीर खुसरो ने कहा था-

’चु मन तुती-ए-हिन्दम अर रास्त पुर्सी

ज़ि मन हिन्दवी पुर्स ता नग्ज गोयम’।

( चूंकि मैं तूती-ए-हिंद हूं, इसलिए मुझसे हिंदवी के सम्बंध में पूछिए ताकि उसमें मैं अपनी काव्य-कला प्रदर्शित कर सकूं )