प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- बेटियां, बेटों से ज्यादा केयरिंग हैं

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- बेटियां, बेटों से ज्यादा केयरिंग हैं


अभी हरेली, रक्षाबंधन का त्यौहार निपटा है। बहनों को लेकर बहुत से भावनात्मक संदेश, गाने, किस्से, कहानी, लोककथाएं, धार्मिक परंपराओं के बावजूद बहनों को पिता की संपत्ति में वो अधिकार नहीं मिलता जैसा की भाई को। लड़की शादी के बाद पराई हो जाती है। हमारे यहां लड़की को पराया धन भी कहा जाता है। हमारे कानून में पहले से ही लड़कियों को पैतृक संपत्ति में अधिकार था किंतु यह अधिकार वैसे ही था जैसे सबको समान रूप से जीने का, शिक्षा का, स्वास्थ्य का, आजादी का और न जाने कौन-कौन से अधिकार हैं। बावजूद इसके भारतीय समाज की मान्य परंपरा, लोकलॉज, पारिवारिक संस्कार, पुरूषवादी मानसिकता के चलते अधिकांश परिवारों में लड़कियां पिता की संपत्ति में अपना अधिकार नहीं मांगती। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरूण मिश्रा, अब्दुल नजीर और एस.आर. शाह की पीठ ने मंगलवार को हिन्दू उत्तराधिकार (संशोधन) कानून 2005 लागू होने से पहले से माता-पिता की संपत्ति में लड़की को अधिकार दिया है। जस्टिस मिश्रा ने कहा है कि बेटियों को बेटों के बराबर अधिकार देना होगा क्योंकि बेटी पूरी जिंदगी दिल के करीब रहती हैं। बेटी  वारिस भी रहेगी, भले ही पिता जिंदा हो या नहीं।

जिनके घर में बहनें हैं, बेटियां हैं वे जस्टिस मिश्रा की इस बात से पूरी तरह सहमत होंगे कि बेटियां पूरी जिंदगी दिल के करीब रहती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने हिन्दू उत्तराधिकार कानून 1956 में किये गये संशोधन पर उठे सवाल के संदर्भ में बेटियों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए यह अहम टिप्पणी भी की है कि बेटियां हमेशा बेटियां रहती हंै। बेटे तो बस विवाह तक ही बेटे रहते हैं। मुझे यह कहने में कतई संकोच या शर्मिंदगी नहीं है कि हम चार लायक आज्ञाकारी बेटों के बावजूद हमारे माता-पिता के ज्यादा नजदीक हमारी दो बहनें रहीं। मेरी अपनी दोनों बेटियां, भतीजियां, दोस्तों के घरों में बहनें, बेटियां, मेरी नजर जहां तक जाती है और मैं जितने परिवारों को जानता हूं, वहां सभी जगह बेटियां, बहनें ज्यादा केयरिंग हैं। वे अपने माता-पिता को लेकर ज्यादा संवेदनशील हैं। तमाम कानूनों, अधिकारों को जानने के बाद भी वे अपने घरों में अपने भाईयों से संपत्ति में अधिकार मांगने खड़ी नहीं होती। बेटियां और बहनें केवल आंसू बहाकर चुप रह जाती हैं जिन्हें अमीर खुसरो जैसा कोई सूफी कवि इस पीड़ा को अपना स्वर देता है -
काहे को ब्याहे परदेसरे सुन बाबुल मोरे । भइया को दीहे महला-दुमहला हमका दीहे परदेस ॥ सुन बाबुल ...॥ हम तो बाबुल तेरे खूट की गइया हाँका - हुँकी जाऊँ परदेस ॥ सुन बाबुल ... ॥ हम तो बाबुल तेरे पिंजरे की चिडिय़ाँ रात बसे उड़ जाऊँ । सुन बाबुल ...॥

हमारा सामाजिक तानाबाना, संस्कार और जन्म से पिलाई गई पराया धन की घुट्टी का प्रभाव इतना गहरा होता है कि लड़कियां विपरित परिस्थितियों में ही शायद पिता की संपत्ति में हिस्सेदारी मांगती हैं। नये दौर की बेटियां तो दामाद के रूप में आज्ञाकारी बेटा भी उपलब्ध करा देती हैं। सुखी दाम्पत्य जीवन के लिए अच्छे पति-पत्नी की हर बात को शिरोधार्य करने की कोशिश करते हैं या करने का बेहतरीन नाटक करते हैं।
हमारे देश में जेंडर के प्रति हमारी सोच का नजरिया यह है कि पुरूष की नकल करने वाली स्त्री को कमोडिटी मानकर उन्हें अपीलिंग या सेक्सिस्ट माना जाता है। संवैधानिक रूप से स्त्री बिल्कुल पुरूष के बराबर है, लेकिन वास्तविक जीवन में, उसकी वह स्थिति नहीं है। स्त्री मुक्ति पर बात करना, स्त्री मुक्ति की कामना करने की मतलब होता है परिवार या पति से अलग तरह की स्वतंत्र सोच। पुरूषवादी व्यवस्था से बाहर सोचकर काम करने वाली स्त्री के प्रति समाज का रवैय्या खाप पंचायतों के फैसले की तरह या घर परिवार के भीतर कथित संस्कार परंपरा के नाम पर लिए जाने वाले फैसले की तरह स्त्री विरोधी होते हैं। स्त्रियों के समान अधिकार की लड़ाई हमारे यहां काफी पुरानी है। यदि हम पंडिता रमाबाई द्वारा लिखित किताबें हिन्दू स्त्री का जीवन किताब पढ़े तो हमें पता चलेगा कि यह शिक्षित विद्रोही, पितृसत्ता की कटु आलोचक रमाबाई 1870 के नागरिक समाज में बड़े विस्फोट के रूप में मौजूद रही। रमाबाई ने हाई कास्ट हिन्दू वूमेन नाम से किताब लिखकर भारतीय स्त्री की दशा की ओर तत्कालीन समाज का ध्यान आकृष्ट किया था। हमारे देश की महिलाओं की पतनशील स्थितियों को सुधारने के उद्देश्य से रमाबाई ने पूना में स्त्रियों की एक संस्था खोली जिसे आर्य महिला समाज नाम दिया गया।

आजादी के बाद स्त्रियों को समान अधिकार दिलाने के संघर्ष में बाबा साहेब आंबेडकर ने केन्द्रीय मंत्री मंडल से इस्तीफा तक दिया। महिलाओं के संघर्ष की कहानी में 1992 में राष्ट्रीय महिला आयोग के संवैधानिक और कानूनी अधिकारों की समीक्षा करना, महिला उत्पीडऩ संबंधी शिकायतों का समाधान ढूंढना और सरकार को महिलाओं से जुड़ी नीतिगत समस्याओं पर परामर्श देना। कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ होने वाली छेड़छाड़ को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने 1997 में विशाखा केस के जरिये विशाखा दिशा-निर्देश जारी कर कार्यस्थल पर महिलाओं से किसी तरह की छेड़छाड़ को मौलिक अधिकारों के हवस का अपराध करार दिया। पंचायती राज अधिनियम के जरिये महिलाओं को त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था में आरक्षण दिया गया। महिला सशक्तिकरण की दिशा में यह बहुत महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ। इन सबके बावजूद आज भी चाहे सरकारी दफ्तर हो या कारपोरेट के ऑफिस या ग्लैमर की दुनिया सब जगह स्त्रियों के साथ छेड़छाड़, दैहिक शोषण के किस्से आम हंै। हमारे यहां स्त्री की ना को ना नहीं समझा जाता।

सुप्रसिद्ध कवियित्री लेखिका अनामिका कहती हैं - उत्तराधिकार - पुत्राधिकार के कई कानून बदले हैं या बदलने की प्रक्रिया में हैं - इन सब परिवर्तनों के दम से परिवार सम्बन्धी धारणाओं में परिवर्तन आ जाना खासा लाजमी है। पूँजी पर एकाधिकार स्त्री पर एकाधिकार का पोषक बना और परिवार के बाद भी वह किसी और के हाथ न जाए - उनकी अपनी औरत, अपनी संतान के परिवार का दर्द और मजबूत बनाकर की। बाद में औरतें जब खुद अपना धन अर्जित करने लगी और विज्ञान ने सुरक्षित सम्भोग और स्वतंत्र गर्भधारण के कई साधन विकसित किए, तब इन प्रतिबंधों का अर्थ खास कुछ रहा ही नहीं।

हमारी त्रासदी यह है कि हम आज तक अतिरेकों में जी रहे हैं, लेकिन हमारा जो आनेवाला कल है वह, विशेषकर स्त्रियों के संदर्भ में सारे प्रचलित मिथक ऐसे तोड़ेगा जैसे कभी  निराला  की नायिका ने पत्थर तोड़े थे। यह भी कम बड़ा परिवर्तन नहीं है कि पढ़ी-लिखी तेजस्वी स्त्रियां आज बहुधा अकेली रह जाती हैं और खासे ठसक के साथ। गए वे दिन, जब बड़ी उम्र की कुंवारियों, परित्यक्ताओं, विधवाओं और मां न बन पा सकने वालियों के साथ डायनपन और कटखनी कटुता का मिथ जोड़ दिया जाता था। आज तो घर के, पड़ोस के अनादृत बूढ़े और बच्चे, बेसहारा स्त्रियाँ बतरस का सुख और थोड़ा चाय-पानी भी इन अकेली स्त्रियों की गृहस्थी में ही पाते हैं-पक्के गृहस्थों के घर तो हम दो हमारे दो की संकीर्णहृदय मतलबपरस्ती ही ज्यादा दिखती है क्योंकि उनका दर्शन  काम से काम, बाकी सब हराम वाला हो गया है दूसरी तरफ यह हो रहा है कि बने-बनाए परिवार भी बड़ी तेजी से टूट रहे हैं- कहीं अहं के टकराव से, कहीं मन में किसी और के आ बसने की बेचारगी के कारण।

हमारा संविधान, हमारे कानून और हमारी धार्मिक परंपराओं, हमारी बातों में महिलाओं के लिए पर्याप्त सुरक्षा सम्मान है किंतु हमारे सामाजिक जीवन में इसके ठीक विपरित आचरण है। कभी निर्भया कांड तो कभी हैदराबाद कांड के रूप में महिलाओं के साथ क्रूरता होती है। अभी हाल ही में बुलंद शहर में देश की होनहार बेटी सुदीक्षा जिसे अमेरिका में चार करोड़ की स्कॉलरशिप मिली थी, से हुई छेड़छाड़ की घटना में उसकी जान चली गई है। इसी तरह दिल्ली में एक बच्ची से अस्पताल में हुई घटना बताती है कि हमारे यहां लोगों की सोच कैसी है। ये सोच बदलनी होगी और बदलेगी भी अब लड़कियां किसी भी क्षेत्र में किसी से कम नहीं हैं।