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पुण्यतिथिः Swami Vivekananda को युवा पीढ़ी की क्षमता, परिवर्तनकारी शक्ति में विश्वास था

पुण्यतिथिः Swami Vivekananda को युवा पीढ़ी की क्षमता, परिवर्तनकारी शक्ति में विश्वास था

निखिल यादव

स्वामी विवेकानंद और उनके शब्द ज्ञान और जीवन के व्यावहारिक पाठों से इतने समृद्ध थे कि प्रसिद्ध विद्वान और नोबेल पुरस्कार विजेता, रवींद्रनाथ टैगोर ने एक बार कहा था ‘यदि आप भारत को जानना चाहते हैं, तो विवेकानंद का अध्ययन करें. उनमें, सब कुछ सकारात्मक है और कुछ भी नकारात्मक नहीं है.’

स्वामी विवेकानंद जिनका जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में एक संपन्न परिवार में नरेंद्रनाथ दत्ता के रूप में हुआ था. 1890 के मध्य में, स्वामीजी भारत की एक लंबी यात्रा पर निकल पड़े. पूरे भारत में अपनी यात्रा के दौरान, स्वामी विवेकानंद भारत की गरीबी और जनता के पिछड़ेपन को देखकर अत्यंत द्रवित हुए. विभिन्न राज्यों से यात्रा करने के बाद, स्वामी विवेकानंद भारत के सबसे दक्षिणी छोर कन्याकुमारी पहुंचे. माता कन्याकुमारी मंदिर से आशीर्वाद लेने के बाद, वह समुद्र के मध्य एक चट्टान पर तैर के पहुंचे जो मुख्य भूमि से अलग हो गया था.वहां, भारत के दक्षिणी भाग में बैठ कर, उन्होंने अपने देश के वर्तमान और भविष्य पर गहन ध्यान किया.

19 मार्च 1894 को शिकागो से स्वामी रामकृष्णानंद को लिखे एक पत्र में, स्वामी विवेकानंद ने निम्नलिखित शब्दों में उस ध्यान को दुबारा याद किया, ‘मेरे भाई, यह सब देखते हु विशेष रूप से (देश की) गरीबी और अज्ञानता के कारण, मुझे एक पल भी नींद नहीं आई. केप कोमोरिन में, भारतीय चट्टान के आखिरी छोर पर बैठे, मैंने एक योजना बनाई.’ दरअसल यह योजना उनके जीवन के मिशन का एक अहसास था जिसने देश को एक हजार साल की गुलामी से मुक्त कर दिया था और अपनी अंतर्निहित महिमा को फिर से खोज लिया था.

स्वामी विवेकानंद ने 31 मई 1893 को पश्चिम की अपनी यात्रा शुरू कर दी ! 30 जुलाई 1893 को वे संयुक्त राज्य अमेरिका पहुंचे, जहां शिकागो में प्रतिष्ठित धर्म संसद होनी थी. उसी वर्ष, महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका गए थे. उन्होंने धर्म की संसद में अपने भाषण की शुरुआत ‘अमेरिका के बहनों और भाइयों’ संबोधन के साथ की थी. उन्होंने आगे उल्लेख किया कि ‘मुझे ऐसे धर्म पर गर्व है, जिसने दुनिया को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति दोनों सिखाया है. हम न केवल सार्वभौम सहिष्णुता में विश्वास करते हैं, बल्कि हम सभी धर्मों को सच मानते हैं … मुझे एक ऐसे देश से संबंधित होने पर गर्व है, जिसने सभी धर्मों और पृथ्वी के सभी देशों के पीड़ितों और शरणार्थियों को शरण दी है. मुझे आपको यह बताते हुए गर्व हो रहा है कि हमने अपने हृदय में इस्राएलियों के सबसे शुद्ध अवशेष को स्थान दिया, जो दक्षिणी भारत में आए थे और उसी वर्ष हमारे यहां शरण ली थी. उनके पवित्र मंदिर को रोमन अत्यचरिओं ने टुकड़े-टुकड़े कर दिया था. मुझे उस धर्म से संबंधित होने पर गर्व है, जिसने शरण ली और अभी भी जिसके अवशेष जोरोस्ट्रियन राष्ट्र को बढ़ावा दे रहे हैं.

धर्म संसद के बाद, स्वामीजी ने लगभग साढ़े तीन साल संयुक्त राज्य के पूर्वी हिस्सों और बाद में लंदन में वेदांत के प्राचीन दर्शन को फैलाने में बिताए. वह जनवरी 1897 में भारत लौटे. उन्होंने भारत के विभिन्न हिस्सों में कई व्याख्यान दिए, जिसने पूरे देश में एक बड़ी हलचल पैदा कर दी. उन्हें हर जगह गर्मजोशी से स्वागत और रोमांचकारी दर्शकों के जवाब मिले. स्वामीजी ने पूरी तरह से एक नये विचार को जन्म दिया. धर्म की एक अलग समझ प्रदान की. उनका यह संकल्प था कि भगवान की सेवा करना है तो पह्ले वह मनुष्य की सेवा करें. उन्होंने अन्य सभी व्यर्थ देवताओं को हमारे मन से कुछ समय के लिए गायब होने की आवश्यकता पर बल दिया. उन्होंने व्यर्थ देवताओं की निरर्थकता को दोहराया और यह आह्वान किया कि लोग उस दिव्यता की पूजा करें जिसे हम अपने चारों ओर देखते हैं. एक स्वाभिमानी भारतीय होने के नाते, स्वामी विवेकानंद अन्य संस्कृतियों के प्रति सम्मानजनक और मिलनसार थे. उन्होंने उल्लेख किया कि ‘वह सब कुछ सीखें जो अच्छा है, इसे अंदर लाएं और अपने तरीके से इसे अवशोषित करें, लेकिन दूसरों के मत बनो. इसे भारतीय जीवन से बाहर नहीं घसीटें, एक पल के लिए यह न सोचें कि भारत के लिए बेहतर होगा यदि सभी भारतीय दूसरों की तरह कपड़े पहने, खाए और दूसरी जाति की तरह व्यवहार करें.

स्वामी विवेकानंद ने लोगों को सशक्त बनाने के लिए प्राथमिक साधन के रूप में शिक्षा पर बहुत जोर दिया. उन्होंने एक बार कहा था, ‘वह शिक्षा जो आम लोगों को जीवन के संघर्ष के लिए खुद को तैयार करने में मदद नहीं करती है, जो चरित्र की ताकत, परोपकार की भावना, और एक शेर की हिम्मत को बाहर नहीं लाती है- क्या वह लायक है ? वास्तविक शिक्षा वह है जो किसी को अपने दम पर खड़ा करने में सक्षम बनाती है. ‘उनके लिए, शिक्षा का मतलब था कि छात्रों में निर्मित चरित्र और मानवीय मूल्यों को सीखने वाली शिक्षा. स्वामी जी को युवा पीढ़ी की क्षमता और परिवर्तनकारी शक्ति में बहुत विश्वास था. उन्होंने उल्लेख किया कि मेरा विश्वास युवा पीढ़ी, में है. आधुनिक पीढ़ी में है. उनमें से मेरे कार्यकर्ता आएंगे. वे शेरों की तरह पूरी समस्या का समाधान करेंगे.

वर्तमान पीढ़ी के लिए एक प्रेरणादायक संरक्षक और युवा आइकन के रूप में, उन्होंने लक्ष्य और एक मिशन-उन्मुख जीवन की आवश्यकता पर प्रकाश डाला. उन्होंने उत्साहपूर्वक व्यक्त किया कि ‘एक विचार उठाओ , उस एक विचार को अपना जीवन बना लो – उसके बारे में सोचो, उसके सपने देखो, उस विचार पर जियो. मस्तिष्क, मांसपेशियों, नसों, और शरीर के प्रत्येक भाग को उस विचार से भरा होने दो और बस हर दूसरे विचार को अकेला छोड़ दो, यह सफलता का मार्ग है.

स्वामीजी का ध्यान एक ऐसे व्यक्ति के समग्र विकास पर था, जिसमें मनुष्य निर्माण राष्ट्र निर्माण के बराबर था और इसमें व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक भलाई शामिल थी. उसके लिए शारीरिक शक्ति प्रबल थी. उन्होंने सलाह दी कि ‘मजबूत बनो, मेरे युवा दोस्तों … गीता के अध्ययन से , फुटबॉल के माध्यम से आप स्वर्ग के करीब होंगे. ये साहसिक शब्द हैं, लेकिन मुझे तुमसे कहना है, क्योंकि मैं तुमसे प्यार करता हूं. इस प्रकार हमें अपनी आवश्यकताओं के लिए इन्हें लागू करना होगा.

19वीं शताब्दी के अंत में, 1857 में असफल भारतीय विद्रोह के बाद, भारत आपदा में खड़ा था. महान और समृद्ध प्राचीन भारतीय सभ्यता, ब्रिटिश साम्राज्य के एकजुट लालच की गुलाम बन गई थी. क्रूर ब्रिटिश कराधान प्रणाली ने दुनिया के सबसे उपजाऊ और प्रचुर कृषि भूमि में से एक को बेकार कर दिया था. 19 वीं सदी भारत में एक के बाद एक अकालों से घिरी हुई थी. उस समय, भारत अपनी ही भूमि पर मुट्ठी भर ब्रिटिश लोगों द्वारा बंदी बना लिया गया था, जिन्होंने बड़ी चतुराई से अपनी शक्ति बनाए रखी, क्योंकि भारतीय अपनी जड़ों और पहचान को पूरी तरह से भूल चुके थे. ऐसे में उस खोई हुई पहचान को एक ऐसे व्यक्ति ने याद दिलाया जो 1857 के विद्रोह के छह साल बाद पैदा हुआ.

महज 39 साल के जीवन में, स्वामी विवेकानंद ने खोए हुए ज्ञान की गूंज को भारतीय प्रवचन की मुख्य धारा में ला खड़ा किया, उनका जीवन और संदेश डेढ़ सदी से अधिक समय के बाद आज भी गूंज उठता है.