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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-ये फिल्म सिटी नही आसां

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-ये फिल्म सिटी नही आसां


बालीवुड यानि मुम्बई फिल्म सिटी की तरह उत्तर प्रदेश ग्रेटर नोएडा से लगे एनसीआर के इलाके में फिल्म सिटी बनाने के लिए इन दिनों यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मुम्बई में फिल्म से जुड़े लोगों से संपर्क कर रहे हैं। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्घव ठाकरे ने उनकी इस पहल पर तंज कसते हुए कहा है कि मुम्बई में चुंबकीय ताकत है, जिसकी वजह से कोई यहां से जायेगा नहीं। फिल्म अभिनेता और राजनेता शत्रुघ्न सिन्हा ने कहा कि सपने देखना अच्छा है किंतु क्या उन प्रदेशों में लॉ एंड आर्डर गतिरोध, बाकी सुविधाएं क्या ऐसी है जो फिल्म सिटी के लिए उपयुक्त है। उन्होंने कहा कि दादा साहेब फाल्के की विरासत को इस तरह कहीं और ले जाना नामुमकिन है।
ये सही है कि केवल अपनी जिद या राजनीतिक लड़ाई के कारण ये शायद ही संभव हो पाये।
सवाल ये भी है कि दुनिया में दूसरा ताजमहल क्यों नहीं बना। इस संदर्भ में उर्दू का एक मशहूर शेर याद आता है कि-

हर वफा जिंदा ए जावेद नहीं होती
दिल का जख्म कहीं दिल का कंवल बनता है
जहां शाहजहां भी हो, मुमताज भी हो दौलत भी
तब जाकर कहीं एक ताजमहल बनता है।

यही हाल मोहब्बत से रची बसी फिल्मी दुनिया का भी है। ये फिल्म सिटी नही है आसां। इसके पहले भी यूपी के नोएडा में फिल्म सिटी बसाई गई थी जो इस समय न्यूज चैनल और समाचार पत्रों का केन्द्र होकर रह गई है। छत्तीसगढ़ में भी फिल्म सिटी बनाने की पहल की गई है। अभी पूरे देश में मुम्बई के अलावा हैदराबाद स्थित रामोजी फिल्म सिटी का क्रेज है। वैसे साऊथ की फिल्में चेन्नई, बैंगलोर, हैदराबाद में तैयार होती है। वहां की सरकारों ने इस तरह का दावा नही किया बल्कि ऐसा वातावरण बनाया कि वहां आज मुम्बई से ज्यादा फिल्में बन रही हैं। बहुत सी साऊथ की फिल्में तकनीक और कथ्य के स्तर पर हिन्दी फिल्मों से बेहतर होती है। वहां की बहुत सी फिल्मों के हिन्दी में रिमेक भी हुए हैं। पूरी दुनिया में इस समय डिजीटल प्लेटफार्म या कहें ओटीटी प्लेटफार्म पर है। इस सुविधा के आने के बाद से घर बैठे फिल्में, वेबसीरिज देखना आसान हो गया है। कोरोना संक्रमण और लॉकडाउन के चलते बहुत से फिल्म निर्माताओं ने अपनी फिल्मों को ओटीटी प्लेटफार्म पर रिलीज किया है। सिनेमा हालों की कमी और एडवांस बुकिंग के चलते छोटे-मोटे फिल्म निर्माताओं को अपनी फिल्में रिलीज करने का अवसर ही नहीं मिलता।

किसी शहर को फिल्म सिटी बनाने की कवायद में बहुत से फैक्टर शामिल होते हैं। केवल कुछ स्टूडियो, कुछ मशीनें और थोड़ा बहुत इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने मात्र से कोई शहर फिल्म सिटी नहीं बन जाता। कला, साहित्य, संस्कृति और सिनेमा सबसे पहले एक खुलेपन और आजादख्याली की मांग करता है। वह अपने रचनात्मक  कार्यों के लिए ऐसा स्पेस, एनवायरमेंट चाहता है जो उसे सोचने समझने और मनमाफिक काम करने की आजादी दे। अपने बालीवुड बनने की यात्रा में मुम्बई ने सारे प्रतिभावान लोगों को बिना जात-पात क्षेत्रीयता के गले लगाया है। हम कितनी ही नेपोटिज्म की बातें क्यों ना कर लें कला की दुनिया में बहुत लंबे समय तक फर्जीवाड़ा या सिफारिशी खेल, भाई भतीजावाद नहीं चलता। यहां वही टिकता है जिसमें प्रतिभा होती है। मुम्बई पेशावर (पाकिस्तान) से आये पृथ्वी राजकपूर से लेकर बिहार से आये प्रकाश झा, शत्रुघ्न सिन्हा, बंगाल से आये बासु भट्टाचार्य से लेकर उत्तरप्रदेश से आये अमिताभ बच्चन, दिल्ली से आये शाहरुख खान को गले लगाती है बशर्तें उनमें प्रतिभा हो।

हिन्दी की और क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्में खूब बने, दर्शक उन्हें देखें इससे किसे गुरेज होगा। फिल्मों के प्रदर्शन के लिए सिनेमा हाल, निर्माण के लिए सब्सिडी और जो निर्भयता और आजादी का माहौल होना चाहिए, क्या वह उत्तप्रदेश में है। नोएडा में बड़े तामझाम से बनी फिल्म सिटी का हश्र क्या हुआ। उत्तरप्रदेश में धार्मिक कट्टरता और संस्कारों की रक्षा के नाम पर आये दिन फिल्मों की शूटिंग  को रोकना, फिल्मों के प्रदर्शन को बाधित करना और अपराधिक तत्वों का जो हस्तक्षेप, दबाव पश्चिमी उत्तरप्रदेश में है, उसके बारे में भी विचार करना होगा। राज्य की सरकारें चाहे तो अपने यहां नई मुम्बई बना ले किन्तु मुम्बई से तुलना करने की, लड़ाई करने की जरुरत नहीं है। फिल्म निर्माण के लिए संस्कार और माहौल की जरूरत है ।

भारत की पहली sound film Alam Ara ड 1931 में आई थी। National film archive of India, pune  के अनुसार 1967 में Alam Ara film   lost film की श्रेणी में डाल दिया गया। इसका मतलब ये किसी भी स्टूडियो में  नहीं पाई जाती। मूवी की बस 1 एक कापी पुणे में रखी गई थी जो 2003 में जल कर खाक हो गई।  

दादा साहब फाल्के हिन्दुस्तान में सिनेमा की नींव रखने वाले जे. जे. स्कूल ऑफ आर्ट से प्रशिक्षित सृजनशील कलाकार थे। वह मंच के अनुभवी अभिनेता थे, शौकिया जादूगर थे। प्रथम भारतीय चलचित्र बनाने का असंभव कार्य करनेवाले वह पहले व्यक्ति बने। उन्होंने 5 पौंड में एक सस्ता कैमरा खरीदा और शहर के सभी सिनेमाघरों में जाकर फिल्मों का अध्ययन और विश्लेषण किया।  

मुम्बई आरके स्टूडियो बॉलीवुड के शो मैन के नाम से मशहूर राजकपूर ने शुरू किया था जो इन दिनो बंद है और उसे उनका परिवार फिर से चालू करने जा रहा है। आर के स्टूडियो को आजादी के ठीक एक साल बाद 1948 में शुरू किया था। इस स्टूडियो की सबसे पहली फिल्म आग थी जिसे 1948 में ही रिलीज किया गया था। निर्देशक महबूब खान, जिन्होंने 1935 में अपनी निर्देशकीय यात्रा शुरू की, उन्होंने पहले ही 1942 में महबूब प्रोडक्शंस की स्थापना की और अनमोल ग़दी (1946) और अंदाज़ (1949) जैसी हिटफि़ल्में कीं। इसी तरह मुम्बई में बहुत से स्टुडियो बने।

अमेरिका का हॉलीवुड, कैलिफोर्निया के पास लॉस एंजिल्स में स्थित है। यह मनोरंजन उद्योग केग्लैमर, धन और शक्ति का पर्याय बन गया है। दुनिया का शो-बिजनेस कैपिटल के रूप में, हॉलीवुड कई प्रसिद्ध टेलीविजन और फिल्म स्टूडियो और रिकॉर्ड कंपनियों का घर है। हॉलीवुड की दन्त कथा 20वीं शताब्दी की शुरूआत में शुरू हुई, जिसकी छाप आधुनिक अमेरिकी समाजकी हिस्ट्री और इनोवेशन पर पड़ी।  

आधुनिक तकनीक के साथ आज घर के टीवी, लैपटॉप, मोबाईल पर  ओटीटी प्लेटफॉर्म के रूप में नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम वीडियो, एमएक्स प्लेयर, हॉटस्टार जैसेऑनलाइन वीडियो उपलब्ध है। स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म और न्यूज वेबसाइट पर चलने वाले सीरियल, शो और प्रोग्राम की निर्माण शूटिंग के लिए भी बहुत सारी सुविधाओं के साथ ऐसा स्पेस चाहिए। जहां कलाकार आजादी के साथ अपना काम कर सके। इसके लिए सरकारों को काम करना चाहिए।

छत्तीसगढ़ की सरकार भी हैदराबाद के रामोजी राव फिल्म सिटी की तरह छत्तीसगढ़ में नवा रायपुर में फिल्म सिटी बनाने जा रही है जिसमें शूटिंग करने के लिए सभी आधुनिक सुविधाएं होंगी। इस फिल्म सिटी में मनमोहक कृत्रिम झरने, झील, पहाड़, गार्डन, क्लब, मैदान, संगीत स्टूडियो, अभिनय प्रशिक्षण केंद्र समेत ढेरों सुविधाएं मिलेंगी।

 नवा रायपुर के पुरखौती मुक्तांगन के समीप लगभग 300 एकड़ क्षेत्र में प्रस्तावित फिल्म सिटीमेंनए कलाकारों को गायन, वादन, अभिनय, लाईट, साउंड, कैमरा, डांस आदि का प्रशिक्षण भीदिया जाएगा। देश के ख्यातिप्राप्त संगीतकार, निर्देशक, कलाकार प्रशिक्षण देने समय-समय पर आमंत्रित किए जाने की योजना है। यहां भी सवाल यही है कि क्या किसी सरकारी सी पहल परजहां नियत निर्माण कार्यो और खरीदी से जुड़ी चीजों पर ज्यादा हो, वहां क्या दादा साहब फाल्केया आर के या मेहबूब स्टुडियों जैसी रचनात्मकता आ सकती है। जहां सरकारे अभिव्यक्ति केखतरे उठाने तैयार ना हो, जहां बात-बात पर जातपात, धर्म जाति प्रेम को लव जिहाद का रंग देने की कानूनी कोशिशें लगातार की जा रही हों वहां पर क्या कोई रचनात्मकता कार्य आसानी से, बिना भय के किया जा सकता है।