छत्तीस घाट : कोलोनड के देवी-देवता. भाजपा की नई खोज. क्लब में 'विषकन्याएं. देखो तो डरो कि. जिंदल साहब फिर चूके. भाजपा की नई खोज. वरिष्ठ पत्रकार अनिल द्विवेदी का विश्लेषण

छत्तीस घाट : कोलोनड के देवी-देवता. भाजपा की नई खोज. क्लब में 'विषकन्याएं. देखो तो डरो कि. जिंदल साहब फिर चूके. भाजपा की नई खोज. वरिष्ठ पत्रकार अनिल द्विवेदी का विश्लेषण

अनिल द्विवेदी : राजनीतिक और सामाजिक खबरों और घटनाओं का विश्लेषण केंद्रित कॉलम.


संभव कोरोना

महामारी के इस युग में कोरोना ने अपने दो रूप तैयार कर लिए हैं, ऐसा लोगों की दिनचर्याएं देखकर लगता है. एक संभव कोरोना है : दूसरा असंभव कोरोना. कुछ को डर है कि चूके तो कोरोना हुआ और मुटठीभर लोगों को लगता है कि कोरोना तो हमसे ही डरेगा.
सरकार ने राज्य के कई जिलों में लॉकडाउन लगा दिया तो इसके पीछे खतरा यही था कि यदि आपने सेनिटाइडर, मास्क और दो गज की दूरी का पालन नही किया तो कोरोना होना संभव है इसलिए घर में सुरक्षित रहिए. सो राजधानी की दस लाख से ज्यादा की आबादी ने अनमने मन से ही सही, अपने पेट पर पत्थर बांधकर, सरकार की बात शिरोधार्य कर घर में कैद हो गए. जिन्होंने घर से निकलने का दुस्साहस किया, उनके लिए पुलिस की लाठी ने खूब डयूटी निभाई लेकिन लाठी भी चलती तो इंसान के दिमाग से ही है. किस पर उठना है, गिरना है, किसे लाल करना है, ये सब इंसानी दिमाग तय करता है! तो ये नजारा हुआ संभव कोरोना का.

असंभव कोरोना

अब इसकी ताकत भी देखिए. राजधानी के क्वींस क्लब मामले में इसकी ताकत का खूब अहसास हो रहा है. जो धनाढय हैं, पॉवरफुल हैं, वे चरित्रहीन हैं और फायरमैन भी. नेता का बेटा हो या व्यापारी का रिश्तेदार, जब तक नियम—कायदे ना तोड़ें, कलेक्टर—एसपी को अंगूठा ना दिखा दें तब तक कौन मानेगा कि ये रसूखदार हैं. प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री तक सेनिटाइडर, मास्क और दो गज की दूरी की वीआईपी सलाह देते रहे पर पॉवरफुल लोगों पर इसका कोई असर नही होता. इनके लिए तो कोरोना असंभव जैसा ही हुआ ना. आखिर वीवीआईपीज के आगे वीआईपीज कुछ होता है भला. असामान्य परिस्थितियों में भी यदि वीआईपीपना नही दिखाया तो कैसे वीआईपी. इसलिए जब सारा शहर घरों में कैद था तो 14 लोगों ने क्वींस क्लब में खूब धमाचौकड़ी मचाई. अभी तीन सप्ताह पहले ही राजधानी के एक होटल में 'डिस्को डांस' होने का वीडियो वायरल हुआ था. पर क्या हुआ, कुछ नहीं. हम तो अपने बाप से नही डरते. ऐसी इनकानसिस्टेंसी यानि बेजोड़ता कहां देखने को मिलेगी. और हां खबरदार जो महिलाओं को कमतर समझा. वे रेप, छेड़छाड़, तलाक जैसे खतरे उठाकर आजादी एंजॉय कर रही हैं.

क्लब में 'विषकन्याएं'

क्वींस क्लब मामले में एक युवती की तलाश है. 28 वर्षीय छबीली नैनों वाली कुड़ी का एक फोटो एक मंत्री के साथ सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है. सुना है कि इस राजनीतिक नेत्री ने डेढ़ साल पहले एनएसयूआई के एक राष्ट्रीय पदाधिकारी पर यौन शोषण का आरोप लगाया था. देशभर में सनसनी मची और पदाधिकारी को पद से हटा दिया गया. तब सोशल मीडिया पर युवती और युवक के वाटसअप चैट वायरल हुए थे. मामले ने राजनीतिक तूल पकड़ा तो राष्ट्रीय पदाधिकारी को पद से हाथ धोना पड़ा और कैरियर भी लगभग चौपट हो गया. उस समय इसी महिला का आरोप था कि हम सभी एनएसयूआई के सम्मलेन के लिए बेंगलुरु में थे. उस समय हमारे नेता बार-बार मैसेज करके मुझे अपने होटल बुला रहे थे. मुझे इसके बारे में बताने की जरूरत नहीं क्योंकि व्हाट्सऐप चैट का स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर मौजूद है. वो मुझे बार-बार मिलने के लिए बुला रहे थे और न आने पर कहते थे कि नहीं मिलोगी तो बात नहीं करूंगा. वो मुझे होटल आने के लिए बोल रहे थे और रात वहीं रुकने के लिए बोल रहे थे और मैंने मना कर दिया. मेरी चिंता यह है कि मैंने अपनी शिकायत ईमेल के जरिए पार्टी को भेजी थी. पता नहीं यह सब कैसे लीक हो गया. मैंने कभी सोशल मीडिया पर ये सब नहीं डाला.’ दरअसल सबूतों और लाचारी के अभाव में, एप्रोचेस के संरक्षण में ऐसी युवतियों का कुछ होता नही है. जितने 'खाने' वाले, उतने बचाने वाले भी. इसलिए मौज बनी रहती है. पिछले जमाने में विषकन्याएं हुआ करती थीं जो विष देकर शिकार करती थीं लेकिन आज के दौर में चैट और मीटू' भी बड़ा हथियार है. कुल मिलाकर कहें तो चरित्र अब तीसरे नम्बर पर है फिर वह पुरूष हो या महिला. सारी वर्जनाएं तोड़ दी जा रही हैं.

देखो तो डरो कि...

कांकेर में पत्रकार की मारपीट वाला वीडियो आपने देखा है क्या! यदि नही तो देखिएगा. लगेगा कि आप किसी साउथ मूवी को देख रहे हैं. नेता विलेन लग रहा है और पत्रकार निरीह जकड़ा हुआ. घटना की चहुंओर निंदा हो रही है और होनी भी चाहिए. रविश कुमार ने क्या गलत कहा था कि एक पत्रकार की मौत पूरे सिस्टम की मौत होती है. फिर इस राज्य में यह कब नही हुआ. पिछले 15 साल का सुराज' भी देख लीजिए. तीन—तीन पत्रकारों की हत्या हुई लेकिन देश की सबसे मजबूत जांच एजेंसी सीबीआई भी हत्यारों को ना पकड़ सकी. ताजा मामले में भी तो आरोपियों को संरक्षण ही दिया जा रहा है. वे चीख—चीखकर कह रहे हैं कि सरकार हम आपके हैं और सरकार खारिज कर दे रहे हैं! हम यहां पत्रकारिता का एकतरफा पक्ष नही ले रहे लेकिन जब नेता—पुलिस—ब्यूरोक्रेटस की खबर बनाने वाले खुद खबर बन जाएं तो सवाल उठने लाजिमी हैं, वो भी न्यायपरक ढंग के. साहित्यकार विष्णु खरे ने कहा है ना : देखो तो डरो कि एक दिन तुम पर भी यह न हो. न देखो तो डरो कि गवाही में बयान क्या दोगे. एज यू शो, सो यू रीप.

जिंदल साहब फिर चूके!

राज्य के जाने—माने उद्योगपति नवीन जिंदल बहुत से खेलों के खिलाड़ी हैं. वे गोल्फ अच्छा खेलते हैं, निशानेबाजी में बहुत से मैडल जीत चुके हैं, घुड़सवारी भी नम्बर वन करते हैं, राजनीति में भी सांसद रहे, लेकिन अपनी पार्टी कांग्रेस में फिट नही हो पा रहे हैं. वे गुटबाजी के शिकार होते जा रहे हैं क्योंकि उनका कोई गुट नही है. 10 जनपथ में चर्चा है कि कांग्रेस की नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी में नवीन जिंदल को अहम जिम्मेदारी मिलने वाली थी. सूची में भी उनका नाम था. राहुल और प्रियंका भी सहमत थे लेकिन सोनिया गांधी के करीब रहे एक हरियाणवी नेता ने उनका पत्ता कटवा दिया. हालांकि नवीन जिंदल को इससे कोई फर्क नही पड़ता. वे राज्यसभा जाने की जुगत में लगे हुए हैं. देखते हैं किस्मत कब गुल खिलाती है.

भाजपा की नई खोज

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष विष्णु देव साय ने अपनी नई टीम की घोषणा कर दी है. इसमें 7 उपाध्यक्ष, 3 महामंत्री, 7 मंत्री, 06 प्रवक्ता सहित कई कार्यकर्ताओं और नेताओं को विभिन्न पदों पर एडजस्ट किया गया है लेकिन सबसे चौंकाने वाला नाम नंदन जैन का है जिन्हें पार्टी ने सह कोषाध्यक्ष बनाया है. इसे प्रदेश महामंत्री संगठन पवन साय की खोज माना जा रहा है. हालांकि इसमें आरएसएस की सहमति भी लगी होगी लेकिन पार्टी ने भविष्य के लिए युवा कोषाध्यक्ष तो खोज ही लिया. नंदन जैन राजधानी रायपुर से ही हैं और आरएसएस से जुड़े थे. उनके पिता स्व.कुंदनलाल जैन सालों तक संघचालक रहे. विधायक बृजमोहन अग्रवाल के रिश्तेदार भी हैं. हालांकि नंदन ने यहां तक का सफर अपनी मेहनत और समर्पण के दम पर पूरा किया है. देखना होगा कि राजनीति में वे कितनी लंबी पारी खेलते हैं क्योंकि सह कोषाध्यक्ष पद बड़ा अहम है.

लास्ट पंच : टिवटर पर यह तस्वीर मिली. एक नर्स ने यह फोटो खींची और बताया कि ये वृद्ध तीन दिनों से अस्पताल में हैं और परिवार का कोई भी सदस्य देखने नहीं आया. पर एक कबूतर दो दिन से आकर उनके बेड पर थोड़ी देर बैठकर चला जाता है. पता चला कि वे अस्पताल के बगल पार्क की बेंच पर बैठकर इस कबूतर को दाना डालते थे!