आख़िर नई शिक्षा नीति आवश्यक क्यों थी?

आख़िर नई शिक्षा नीति आवश्यक क्यों थी?

ऐश्वर्य पुरोहित

सन 2015 में जब भारत की तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री श्रीमती स्मृति ईरानी ने नई शिक्षा नीति के निर्माण की बात कही थी, तभी से लोगों के मन में यह प्रश्न बार-बार उठता रहा है कि आखिर देश के लिये नई शिक्षा नीति की आवश्यकता महसूस करने के पीछे क्या कारण हैं? और अब जबकि केंद्रीय मंत्रिमंडल ने देश में शक्षिा के लिए नवीन राष्ट्रीय नीति को स्वीकृति प्रदान कर दी है, यह प्रश्न एक बार फिर उठ रहा है कि आख़िर इसकी आवश्यकता क्या थी? इस प्रश्न के उत्तर में दो प्रमुख कारण गिनाए जा सकते हैं - पहला, शिक्षा का चिरप्रतीक्षित स्वदेशीकरण या भारतीयकरण, जिसकी मांग 20वीं सदी के प्रारम्भिक वर्षों में शुरू हुए राष्ट्रीय शिक्षा आंदोलन के समय से उठती रही है; और दूसरा कारण है, शिक्षा का आधुनिकीकरण क्योंकि अन्तिम नीति 1986 में निर्धारित की गयी थी जिसके बाद प्रौद्यौगिकी के तेज गति से हुए विकास ने राष्ट्रीय परिवेश में बहुत बड़ा परिवर्तन उत्पन्न किया है। किन्तु इसी अनुपात में शिक्षा प्रणाली में कोई परिवर्तन नहीं हुए जिसके कारण शिक्षा हमारी राष्ट्रीय और सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने में अक्षम थी।

अब ये प्रश्न उठता है कि शिक्षा का स्वदेशीकरण क्या है और उसकी क्या आवश्यकता है? तो इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिये हमें भारत की वर्तमान शिक्षा प्रणाली के इतिहास और इसकी अपने वर्तमान स्वरूप को प्राप्त करने तक की यात्रा पर एक विहंगम दृष्टि डालनी होगी। वैसे तो भारत में शिक्षा की एक प्राचीन सुदीर्घ परम्परा रही है, जिसके पन्ने इतिहास में यत्र-तत्र बिखरे हुए हैं किन्तु हमारी आधुनिक शिक्षा प्रणाली के इतिहास के सम्बन्ध में तनिक भी अस्पष्टता नहीं है। भारत की इस आधुनिक शिक्षा का सूत्रपात 16वीं शताब्दी में यूरोपीय मिशनरियों के भारत में पदार्पण से हुआ। यह तो स्पष्ट ही है कि इन मिशनरियों का एकमात्र उद्देश्य भारतवासियों को ईसाई पंथ का अनुयायी बनाना ही था और इसीलिये उन्होंने विभिन्न शिक्षा संस्थानों को प्राथमिकता से प्रारम्भ करते हुए भारत में पाश्चात्य शैली की शिक्षा का प्रवर्तन किया। सन1792 ई. में लिखे गए चार्ल्स ग्रांट के विवरण पत्र ने जहाँ भारतीयों को ईसाइयत की शिक्षा देने की वकालत की वहीं भारतीय शिक्षा पर मैकाले के सन 1835 के विवरण पत्र ने ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति निष्ठावान वर्ग तैयार करने के प्रयासों पर जोर दिया।2 भारत एवं प्राच्य संस्कृति के प्रति दुराग्रहों से भरे पड़े इस विवरण पत्र के माध्यम से मैकाले ने भारतीयों के लिए अंग्रेजी शिक्षा का यशगान करते हुए सरकारी धन से अंग्रेजी शिक्षा ही प्रदान करने की सलाह दी। गवर्नर-जनरल ने भी मैकाले के विचारों का अनुमोदन करते हुए अंग्रेजी ढंग की शिक्षानीति की घोषणा कर दी। यह घटना भारत की शिक्षा प्रणाली को वर्तमान स्वरूप प्रदान करने में निर्णायक भूमिका अदा करने वाली सिद्ध हुई। सन 1839 में तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड ऑकलैण्ड ने एक विवरण पत्र के माध्यम से शिक्षा में निस्यंदन -सिद्धांत (Filtration Theory) को शिक्षानीति के प्रधान तत्त्व के रूप में स्वीकृति प्रदान की। निस्यन्दन का शाब्दिक अर्थ होता है - छानना।  इस विवरण पत्र3 में जिस सिद्धान्त को स्वीकार गया उसके अनुसार सरकारी प्रयासों से केवल उच्च वर्गों तक ही शिक्षा का प्रसार किया जाना चाहिए। जन सामान्य तक शिक्षा इन उच्च वर्गों की संस्कृति से ही छन-छन कर जाना चाहिए। इस नीति ने अंग्रेजी सीखकर सरकारी नौकरी पाने वाले भारतीयों में श्रेष्ठता की दुर्भावना का बीजारोपण किया और आगे चलकर इस बीज ने ऐसी विषबेल का रूप धारण कर लिया जिसमें सम्पूर्ण भारतीय समाज आज तक जकड़ा हुआ है। ये अंग्रेजीपरस्त उच्चवर्गीय भारतीय तथाकथित निम्न वर्ग (अंग्रेजी नही जानने वाले लोगों का वर्ग) से मिलने में भी अपमान महसूस करने लगे। दुर्भाग्यवश आज भी यही स्थिति बदस्तूर जारी है। पूर्व प्रधानमंत्री स्व. जवाहरलाल नेहरु ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक भारत की खोज में इसका उल्लेख करते हुए लिखा है, ‘‘व्यवसायों एवं सेवाओं में अंग्रेजी शिक्षित लोगों के प्रभाव ने एक नए वर्ग को जन्म दिया जिसका विकास पूरे भारत में हुआ। यह एक ऐसा वर्ग था, जो पाश्चात्य विचारों एवं जीवन शैली से तो प्रभावित था किन्तु अपने ही देश के बाकी सामान्य लोगों से कट कर रह गया था।’’

इस प्रकार भारतीय शिक्षा के अंग्रेजीकरण की कालावधि कहे जाने वाले 1833 से लेकर 1854 तक के इस कालखण्ड ने भारतीय समाज को उच्च एवं निम्न वर्गों में विभक्त  कर उनके बीच एक ऐसी दीवार खींच दी, जिसे अभी तक नहीं तोड़ा जा सका है। इस कालावधि में सामान्य जनमानस तक शिक्षा के प्रसार को असम्भव मानकर इसे केवल उच्चवर्गों तक ही सीमित कर दिया गया। भारत की देशी शिक्षा पद्धति समाप्त हो गई। इसकी जगह पाश्चात्य शिक्षा ने ले ली और इसके साथ ही शिक्षा पर मिशनरियों एवं अंग्रेजी हुकुमत का आधिपत्य हो गया। सन 1854 के वुड के आदेश-पत्र5 ने शिक्षा में परीक्षा को सर्वोपरि बना दिया। इसके कारण शिक्षार्थियों का मूल उद्देश्य ज्ञानार्जन न रहकर महज परीक्षा उत्तीर्ण करना ही रह गया। आज भी हमारी शिक्षा व्यवस्था में हमें यही बात परेशान कर रही है। इसके बाद 1882 के हण्टर आयोग, 1917 के कलकत्ता विश्वविद्यालय आयोग (1917-1919) और 1927 के साइमन कमीशन की सर फिलिप हर्टांग की अध्यक्षता वाली सहायक समिति ने शिक्षा पर सरकार को सुझाव दिये। हर्टांग समिति ने सरकार से एक केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड के गठन की सिफारिश की थी जिसे मानते हुए सरकार ने 1935 में इसका गठन किया। यह बोर्ड आज भी अस्तित्व में है। किन्तु 2020 की शिक्षा नीति के अनुसार राष्ट्रीय शिक्षा आयोग अब इसका स्थान लेगा। इसके बाद वुड-एबट रिपोर्ट और सार्जेण्ट योजना के माध्यम से स्वतंत्रता पूर्व अंतिम बार शिक्षा प्रणाली में संशोधन किए गए।

कुछ लोग यह मानते हैं कि अपने अन्तिम समय में ब्रिटिश शासन ने हमें हमारी आधुनिक शिक्षा प्रणाली देकर हमारा भला ही किया है। किन्तु वे यह नहीं देख पा रहे हैं कि जिसे हम आधुनिक शिक्षा कहकर आंग्लभाषियों के कृतज्ञ हुए जा रहे हैं वह एक ऐसी शिक्षा प्रणाली है जो भारत के चरित्र से बिल्कुल मेल ही नहीं खाती। और इसीलिए भारत में ज्ञान की गंगा लगभग मृतप्राय हो गयी। हम यह भूल गए हैं कि शिक्षा के उच्च आदर्शों से अनुप्राणित एक समृद्ध राष्ट्र में केवल व्यापार के लिए आने वाली उस आंग्लजाति ने ही भारत की संस्कृति, अर्थव्यवस्था को नष्ट कर उसे मृतप्राय शिक्षा प्रणाली वाले एक श्रीहीन राष्ट्र में बदल दिया था। किन्तु पराधीनता के साथ ही भारत का दुर्भाग्य भी समाप्त हो गया, ऐसा नहीं कहा जा सकता। 1947 में राजनीतिक गुलामी की बेड़ियाँ तो चटक गईं किन्तु वैचारिक एवं मानसिक बेड़ियों ने हमें आज़ाद नहीं किया। स्वाधीनता की खुली हवा में नयी श्वास लेने वाले भारतवर्ष में शिक्षा व्यवस्था के सुसंगठन की आवश्यकता महसूस की जाने लगी। अत: 1948 में उच्च शिक्षा के पुनर्गठन के उद्देश्य से विख्यात शिक्षाविद् एवं दार्शनिक डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की अध्यक्षता में विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग की नियुक्ति  गई। यह आयोग राधाकृष्णन आयोग के नाम से जाना जाता है। स्वतन्त्र भारत के शिक्षा सम्बन्धी इस पहले आयोग ने 25 अगस्त 1949 को अपना प्रतिवेदन भारत सरकार के समक्ष प्रस्तुत किया। विश्वविद्यालयीन शिक्षा का सांगोपांग अध्ययन कर इस आयोग ने सुधार संबंधी अनेक महत्त्वपूर्ण सुझाव दिये। इस आयोग ने विश्वविद्यालयीन शिक्षा का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए दूरदर्शी, बुद्धिमान और बौद्धिक साहस जैसे गुणों से युक्त  एक ऐसे युवावर्ग को तैयार करनी की आवश्यकता पर बल दिया जो एक ओर तो भारत की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत को अपनाने वाले एवं उसमें योगदान देने वाला हो, तो दूसरी ओर वह लोकतंत्र के न्याय, स्वतंत्रता, समानता एवं बंधुता जैसे आदर्शों का प्रतीक एवं संरक्षक बने। विश्वविद्यालयीन शिक्षा में सुधार हेतु अनेक नवाचारी एवं रचनात्मक उपायों के साथ ही इस आयोग ने ही सर्वप्रथम ग्रामीण शिक्षा की ओर जनमानस का ध्यान आकृष्ट करने में सफलता प्राप्त की थी। आधुनिक भारत में पहली बार भारत के शैक्षिक एवं सांस्कृतिक आदर्शों को शिक्षानीति में स्थान दिये जाने की पक्षकार ये सिफारिशें भारत में उच्चशिक्षा का कायाकल्प कर सकतीं थी। किन्तु यह भारत का दुर्भाग्य ही था कि इस आयोग की अधिकांश सिफारिशों और प्रस्तावों को कभी क्रियान्वित ही नहीं किया गया।

आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों में तेजी से हो रहे परिवर्तनों के साथ सामंजस्य बिठाने के लिए माध्यमिक शिक्षा में भी सुधार की आवश्यकता अनुभव कर 23 सितम्बर 1952 को मद्रास विवि के तत्कालीन कुलपति डॉ. ए. लक्ष्मणस्वामी मुदालियर की अध्यक्षता में माध्यमिक शिक्षा आयोग  का गठन किया जिसने जून 1953 में आयोग ने 15 अध्यायों मे विभक्त  एवं दो सौ से भी अधिक पृष्ठों का अपना प्रतिवेदन सरकार के समक्ष प्रस्तुत किया। आयोग ने माध्यमिक शिक्षा को नीरस, निरा पुस्तकस्थ, संकुचित एवं रूढ़िवादी बताते हुए इसके उद्देश्य पर प्रकाश डाला। आयोग के अनुसार माध्यमिक शिक्षा को विद्यार्थियों में जनतांत्रिक नागरिकता, व्यावसायिक कुशलता, व्यक्तित्व एवं नेतृत्व आदि गुणों के विकास के महान उद्देश्य से संचालित किया जाना चाहिए। आयोग ने प्रचलित परीक्षा प्रणाली को वास्तविक ज्ञान का मूल्यांकन करने में असमर्थ पाया। आयोग ने परीक्षाओं में निबन्धात्मक प्रश्नों के स्थान पर वस्तुनिष्ठ प्रकार के प्रश्न पूछने की सलाह दी। उल्लेखनीय है कि उच्च शिक्षा में प्रचलित परीक्षा प्रणाली को लेकर ऐसे ही विचारों के साथ राधाकृष्णन आयोग ने भी यही सलाह दी थी। कुल मिलाकर, मुदालियर आयोग के ये प्रस्ताव माध्यमिक शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन लाने वाले सिद्ध होते; किन्तु भारतीय शिक्षा के दुर्भाग्य ने माध्यमिक शिक्षा आयोग की सिफारिशों को भी क्रियान्वित नहीं होने दिया और सरकार ने इसके भी अधिकांश सुझावों को नहीं माना।

स्वातंत्र्य प्राप्ति के छ: वर्षों के भीतर ही सरकार द्वारा गठित दो आयोगों ने देश की उच्च शिक्षा एवं शालेय शिक्षा को लेकर कई क्रान्तिकारी सुझाव दिए थे। किन्तु उनकी अधिकांश सिफारिशों को सरकार ने नहीं माना और इसके महज 10 वर्षों बाद ही सरकार ने 1964 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष प्रो. डी. एस. कोठारी की अध्यक्षता में शिक्षा आयोग का गठन किया। यह आयोग कोठारी आयोग के नाम से जाना जाता है। इस आयोग को समग्र शिक्षा पर प्रतिवेदन प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया था। इसके अनुपालन में आयोग ने प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक शिक्षा के सभी स्तरों पर सुझाव दिए। वर्तमान में शिक्षा की 10+2+3 व्यवस्था इसी आयोग की सिफारिश थी। इस आयोग के अधिकांश सुझाव अधूरे थे, क्योंकि इनमें केवल क्या किया जाना चाहिए, ये ही बताया गया किन्तु कैसे और कब किया जाए आदि प्रश्नों पर चर्चा ही नहीं की गई। तथापि सरकार ने इसे मानकर इसे ही राष्ट्रीय शिक्षा नीति-1968  के रूप में लागू कर दिया। यह तो स्वाभाविक ही है कि इससे शिक्षा व्यवस्था का उद्धार तो न हो सका किन्तु शिक्षा के स्वदेशीकरण अर्थात् भारतीयकरण का स्वप्न भी टूट गया। इस नीति की असफलता को भारत सरकार की 1986 की शिक्षा नीति के लेख ने इस तरह व्यक्त  किया है, 1968 की शिक्षा नीति के अधिकांश सुझाव कार्यरूप में परिणत नहीं हो सके, क्योंकि क्रियान्वयन की पक्की योजना नहीं बनी, न स्पष्ट दायित्त्व निर्धारित किए गए, और न ही वित्तीय एवं संगठन संबंधी व्यवस्थाएँ हो सकीं। नतीजा यह है कि विभिन्न वर्गों तक शिक्षा पहुँचाने, उसका स्तर सुधारने और विस्तार करने और आर्थिक संसाधन जुटाने जैसे महत्त्वपूर्ण कार्य नहीं हो पाए और आज इन कमियों ने एक बड़े अम्बार का रूप धारण कर लिया है। इन समस्याओं का हल निकालना समय की पहली आवश्यकता है।

सन 1968 की दोषपूर्ण शिक्षा नीति के दोषों को दूर कर भारत की शिक्षा व्यवस्था में युगानुकूल सुधार लाने के दृष्टिकोण से 1986 में भारत सरकार ने नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति संसद में प्रस्तुत की जिसे मई 1986 में संसद की मंजूरी मिल गई। 1990 में आचार्य राममूर्ति की अध्यक्षता में इस शिक्षा नीति के पुनरीक्षण हेतु एक समिति बनाई गई जिसके सुझावों के आधार पर 1986 की नीति में आवश्यक संशोधन किए गए। यही शिक्षा नीति अब तक जारी है। वास्तव में इस नीति में पुरानी नीति के ही विविध पक्षों को थोड़े-बहुत नए कलेवर के साथ समाविष्ट किया गया था। पुरानी ही नीति की तरह इसके भी क्रियान्वयन की उचित रूपरेखा नहीं बन सकी। फलस्वरूप इसे भी कार्य रूप में परिणत नहीं किया जा सका। आज हमें शिक्षा में जो दोष दिखाई पड़ रहे हैं, वे इस बात के द्योतक हैं कि आज़ादी के साढ़े चार दशकों में दो नीतियाँ बनाकर भी हम गुणवत्तापरक शिक्षा को भारत के सर्वसाधारण के लिये सुलभ व उपयोगी नहीं बना सके। वास्तविकता केवल संख्यात्मक विकास में ही रही, गुणवत्ता केवल सरकारी दस्तावेजों तक ही सिमट कर रह गयी। यह तो निश्चित है कि स्वतन्त्रता के बाद शिक्षा की बेहतरी के लिए निष्ठावान प्रयास किए गए होते तो हमारी नई पीढ़ी को भी भारतीय संस्कृति के वैशिष्ट्य को समझने में आसानी होती और भारतीयों में स्वाध्याय की तेजी से घट रही प्रवृत्ति को बचाने में सहायता मिलती। और इन्हीं कारणों से भारत को आज ऐसी शिक्षा नीति की आवश्यकता थी जो भारत के राष्ट्रीय चरित्र की रक्षा में सक्षम शिक्षा प्रणाली विकसित कर सके। हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली नीरस और उबाऊ है जिसके कारण भारतीय परम्परा के उलट विद्यार्थियों की व्यक्तिगत क्षमताओं का विकास नहीं हो पा रहा है।

हालाँकि, यह तो एक कारण हुआ, किन्तु नई शिक्षा नीति की आवश्यकता महसूस किए जाने के जिस दूसरे कारण का मैंने पूर्व में उल्लेख किया है, उसका तात्पर्य क्या है? तो इसे हम कुछ इस तरह समझ सकते हैं कि 1986 (92) की नीति इंटरनेट क्रांति के ठीक पहले लागू की गई थी जो तकनीकी के कारण होने वाले आमूलचूल परिवर्तनों का अनुमान नहीं लगा सकी थी। तभी से हम शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने में प्रौद्योगिकी के उपयोग एवं शिक्षा संबंधी विषयों को लेकर काफी धीमे रहे हैं। प्रौद्योगिकी एवं तकनीकों से समृद्ध परिवेश में जन्मने एवं बढ़ने वाली नई पीढ़ी भविष्य में उन तकनीकों का भी उपयोग और उपभोग करेंगी जिनका तो अभी तक आविष्कार ही नहीं हुआ है। वे ऐसे क्षेत्रों में रोजगार प्राप्त करेंगे जो अभी तक अस्तित्व में ही नहीं है। ठीक उसी तरह जिस तरह कम्प्यूटर प्रौद्योगिकी आने के बाद अनेक पुराने रोजगार समाप्त हुए जिनके स्थान पर नवीन तकनीकी पर आधारित रोगजागों का सृजन हुआ। अत: सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक जगत की आवश्यकताओं के साथ ही बदलती हुई व्यक्ति गत आवश्यकताओं व राष्ट्रीय विकास लक्ष्य को भी प्रासंगिक बनाए रखने के लिए शिक्षा में नवीनीकरण आवश्यक है। यह तो एक बात हुई पर दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि वर्ष 2030 तक के लिए वैश्विक सतत विकास लक्ष्य 4 (SDG 4) के अन्तर्गत सात लक्ष्यों में से पाँच लक्ष्य गुणवत्तापरक शिक्षा और शिक्षा के प्रतिफलों पर केन्द्रित हैं। इन वैश्विक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए गुणवत्तापरक शिक्षा की एक प्रभावी प्रणाली की आवश्यकता होती है। आज की रटंत प्रणाली पर आधारित शिक्षा व्यवस्था एसडीजी-4 के लक्ष्यों को प्राप्त करने का सामर्थ्य नहीं रखती है। अब चूँकि शैक्षिक नवाचार शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन नहीं ला सकते हैं, इसीलिए पूरी शिक्षा प्रणाली को नए ढाँचे मे ढालने की आवश्यकता थी। इस प्रकार मेरे विचारों से शिक्षा का बहुप्रतीक्षित स्वदेशीकरण, नई तकनीकों के साथ सामंजस्य बिठाकर सतत विकास लक्ष्यों  को प्राप्त करना आदि कुछ प्रमुख कारण है कि भारत में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति की आवश्यकता एक लम्बे समय से महसूस की जा रही थी। नवीन राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने इन दोनों ही बातों को समझकर एक भारत केन्द्रित किन्तु अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर विकास लक्ष्यों को प्राप्त कर सकने में सक्षम शिक्षा व्यवस्था तैयार करने की एक विस्तृत रूपरेका तैयार की है। आशा है कि यह नीति कार्यरूप में परिणत हो सकेगी।