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जनता की सरकार और आंदोलन की जनता

जनता की सरकार और आंदोलन की जनता

ध्रुव शुक्ल

अपने आपको लोकतंत्र का चौथा खंबा मानने वाले मीडिया को देश का संविधान फिर पढ़ लेना चाहिए जिसमें देश का राज्य जनता की शक्ति में निहित है, किसी राजनीतिक दल की भीड़-भाड़ में नहीं। देश के जन अपने-अपने मताधिकार से चुने हुए प्रतिनिधियों को सुशासन के प्रबंधन का दायित्त्व मात्र पाँच साल के लिए सौंपते हैं और पसंद न आने पर अगले चुनाव में उन्हें बदल भी सकते हैं।

देश में सरकार जनता की होती है। जनता की चुनी हुई सरकार के खिलाफ होने वाला कोई भी आंदोलन जनता को ही इस बात पर आगाह करने के लिए होता है कि वह अपनी चुनी हुई सरकार को न्याय करने के प्रति चेताने के लिए आंदोलनकारियों के साथ खड़ी हो जाये। लोकतंत्र में बंद रास्तों को खोलने का यही कारगर उपाय है।

मीडिया जनता को अन्याय के प्रति जागरूक बनाने के बजाय उसे इस भ्रम में डालता है कि आंदोलन होने से जनता को तकलीफ हो रही है। वह यह नहीं सिखाता कि जनता का रास्ता इस लिए रोका गया है क्योंकि जो सरकार जनता ने चुनी है  वह किसानों को सता रही है। जनता अगर यह जानेगी तो फिर आंदोलित किसानों से बचकर नहीं निकलेगी बल्कि उनके साथ खड़ी होकर उनकी आवाज़ को और ऊँचा उठाकर अपनी सरकार के कान खड़े करेगी। अगर सरकार मनमानी पर उतरेगी तो जनता उसे बदल देगी।

जनता की सरकार और आंदोलन की जनता के बीच छलपूर्ण विभाजन करना लोकतंत्र के लिए विनाशकारी है।