कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः कौन बंधाये धीरज

 कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः कौन बंधाये धीरज


पल-पल मिटते जीवन में

बचा रहता है विश्वास

इसी पर ठहरा है जग

बची रहे श्रद्धा की तान


यह कैसा अनजान जहान

क्या इसका प्रतिमान

जन-मन में बढ़ता अविश्वास

कहाँ मग, कहाँ धरें पग

यह कैसा प्रतिदान


मिटती जाती प्रतिदिन

जनहित की हर इच्छा 

परहित की हर शिक्षा 

देखभाल के साधन 

बोलचाल-आराधन 

सब मिटते जाते

घटता जीवन का मान


कौन बंधाये धीरज

दे कौन सान्त्वना

कौन बो रहा क्लेश

कहाँ डूबता देश

खो रही है जग की पहचान


जग-चरित हुआ अपराधी

जीवन अपयश की व्याधी