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क्या भारत बड़े मानसिक स्वास्थ्य संकट की तरफ बढ़ रहा है

क्या भारत बड़े मानसिक स्वास्थ्य संकट की तरफ बढ़ रहा है

आदित्य शर्मा

भारत में कोरोना संकट ने करोड़ों लोगों को अलग थलग और बेरोजगार कर दिया है. डॉक्टर चेतावनी दे रहे हैं कि चिंता, डिप्रेशन और आत्महत्या के मामले बढ़ सकते हैं और देश में मानसिक स्वास्थ्य नए संकट का रूप ले सकता है.

शगुन ने पिछले तीन महीनों से खुद को बाहरी दुनिया की खबरों से अलग रखा है. वह अपने सोशल मीडिया प्रोफाइल को भी देखने की हिम्मत नहीं जुटा पाती हैं. 23 साल की शगुन दिल्ली के पास गुरुग्राम में रहती हैं और कोरोना महामारी के इस दौर में अत्यधिक डिप्रेशन से गुजर रही हैं.

वह कहती हैं, "मुझमें डिप्रेशन के लक्षण कभी ज्यादा हो जाते हैं और कभी कम. अचानक मुझे पता नहीं चलता कि आगे क्या करूं. मैं उलझ सी जाती हूं. सब कुछ ठप सा हो जाता है. फिर मैं किसी और चीज पर ध्यान नहीं लगा पाती हूं. इससे मेरे मन में नकारात्मक बातें ही आती हैं."

कोरोना संकट को देखते हुए भारत ने 24 मार्च को देश भर में लॉकडाउन लागू किया. इससे 1.3 अरब लोगों की जिंदगी एकदम थम गई. इससे बहुत से लोग बेरोजगार भी हो गए. ऐसे में तनाव और चिंता होना लाजमी है. महामारी से पहले जिन्हें कभी मानसिक समस्याएं नहीं हुई, उन्हें भी तनाव और चिंता घेरने लगी.

शगुन के लिए लॉकडाउन का मतलब है इंटर्नशिप के उन मौकों को गंवा देना, जो उन्हें करियर में आगे बढ़ने के लिए मददगार हो सकते थे. वह कहती हैं, "ऐसा भी समय आया जब मुझे भूख लगनी ही बंद हो गई. मैं 10-11 दिन तक ठीक से नहीं खा पाई. और ना ही इस दौरान ठीक से सो पाई."

शगुन को हर समय यही चिंता लगी रहती थी कि कहीं उन्हें कोरोना वायरस ना लग जाए. वह बताती हैं, "मैं हर दिन कम से कम बीस बार हाथ धो रही थी और बाहर जाना बिल्कुल ही बंद कर दिया." यहां तक कि जब उनका नजर का चश्मा टूट गया, तो संक्रमण के डर से नया चश्मा खरीदने भी वह बाहर नहीं गईं. वह लॉकडाउन खुलने का इंतजार कर रही थीं. लेकिन इसे बार बार बढ़ाए जाने से उनमें लाचारी की भावना घर करती गई. वह कहती हैं, "मैं दौड़ने के लिए बाहर जाती थी, जिम जाती थी या फिर दोस्तों से मिलती थी. सब कुछ बंद हो गया. मैंने खुद को पिंजरे में बंद पाया."

इंडियन सायकाइट्री सोसाइटी (आईपीएस) के एक हालिया सर्वे में पता चला है कि लॉकडाउन लागू होने के बाद से मानसिक बीमारियों के मामले 20 फीसदी बढ़े हैं और हर पांच में से एक भारतीय इनसे प्रभावित है.

आईपीएस ने चेतावनी दी है कि भारत में हाल के दिनों में कई कारणों से मानसिक संकट का खतरा पैदा हो रहा है. इनमें रोजी-रोटी छिनना, आर्थिक तंगी बढ़ना, अलग थलग होना और घरेलू हिंसा बढ़ना शामिल हैं. ये कारण किसी व्यक्ति को आत्महत्या के लिए भी उकसा सकते हैं.

सेंटर फॉर मेंटल हेल्थ, लॉ एंड पॉलिसी के निदेशक सौमित्र पठारे कहते हैं, "मुझे संदेह है कि हमें मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर अब दिखने लगेंगे. यह संकट अब लोगों को प्रभावित कर रहा है." उन्होंने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा, "हालात का सामना करने की हमारी सबकी एक सीमा है और अगर ज्यादा समय तक बहुत ज्यादा तनाव रहे तो हम उससे निपटने की अपनी क्षमता खो देते हैं."

मनोवैज्ञानिक चेतावनी देते हैं कि महामारी के इस दौर में बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए खासतौर से दिक्कतें हो सकती हैं. उन्हें दोस्तों से अलग थलग अपने घरों में रहना पड़ रहा है. वे घर में तनाव और कहीं कहीं हिंसा का गवाह भी बन रहे हैं. इसलिए उनके मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ सकता है.

पठारे कहते हैं, "हम जानते हैं कि जब बच्चे इस तरह के माहौल में बड़े होते हैं तो उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए किस तरह के जोखिम पैदा होते हैं. मौजूदा परिस्थितियां उनके लिए जोखिमों को बढ़ाएंगी." वह चेतावनी देते हैं, "बच्चों के शोषण के मामले बढ़ सकते हैं. अगर बड़ों में तनाव और गुस्सा है तो वह बच्चों पर हिंसा के रूप में निकल सकता है. इसलिए यह बड़ी चिंता का कारण है."

स्वतंत्र रिसर्चरों के एक हालिया सर्वे में पता चला है कि भारत में लॉकडाउन के कारण कोरोना वायरस से इतर होने वाली मौतों में आत्महत्या एक बड़ा कारण है. सर्वे के मुताबिक, इस साल मार्च में 125 लोगों की मौत संक्रमण के डर, अकेलेपन, बाहर आने जाने की आजादी छिन जाने या फिर घर न जा पाने की हताशा के कारण हुई. अध्ययन में वित्तीय तंगियों और शराब ना मिल पाने को भी आत्महत्या के कारणों में गिनाया गया है.

पठारे कहते हैं कि भारत में अगले छह से 12 महीनों के दौरान मानसिक स्वास्थ्य एक बड़ा संकट बन सकता है. वह कहते हैं, "हमारे सामने एक आर्थिक संकट मंडरा रहा है जिसकी वजह से ज्यादा आत्महत्याएं, शराब की लत और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मामले सामने आएंगे. पिछले वित्तीय संकट में भी हमने ऐसा ही देखा था."

नरेंद्र मोदी सरकार ने 2017 में मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम पेश किया था जिसके तहत सरकारी स्वास्थ्य देखभाल और इलाज के जरिए लोगों का अच्छा मानसिक स्वास्थ्य सुनिश्चित करने की बात कही गई थी. पठारे कहते हैं, "भारत में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बहुत प्रगतिशील कानून और नीतियां हैं. हमारी समस्या सामाजिक क्षेत्र से जुड़ी है. इसके कारण कानून और नीतियों को जमीनी स्तर पर प्रभावी तरीके से लागू नहीं किया जाता है."

पठारे बीते एक दशक में लोगों के बेहतर मानसिक स्वास्थ्य के लिए सरकार की तरफ से उठाए गए कदमों की सराहना करते हैं. लेकिन वह कहते हैं कि अब भी बहुत बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जिनको उचित इलाज नहीं मिल पा रहा है. उनके मुताबिक, "भारत में मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति बीते 10 साल में निश्चित रूप से बेहतर हुई है. लेकिन क्या यह पर्याप्त है? बिल्कुल नहीं."