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II शब्द-श्रद्धांजलि : एक संपादक जिनके मूल्यों के आगे बाजार हारा, स्व.पं.बबन प्रसाद मिश्र

II शब्द-श्रद्धांजलि : एक संपादक जिनके मूल्यों के आगे बाजार हारा, स्व.पं.बबन प्रसाद मिश्र


पत्रकारिता की आदर्श पगडंडी हैं पं. बबन प्रसाद मिश्र : पुण्यतिथि पर विशेष

अनिल द्विवेदी


साल 2000 के फरवरी माह का कोई दिन था. श्वेत-धवल वस्त्रों में लिपटी गौरवर्ण की काया, वात्सल्यमयी मुस्कान लिए विद्वान संपादक के समक्ष जैसे ही पहुंचा, उन्होंने बैठने का इशारा किया और सीधे पूछ लिया : कलम रखे हो. ग्रेजुएशन के बाद पहली नौकरी पाने के उत्साह से लबरेज मैंने स्वीकृति में सिर हिलाया और अपनी इंटरव्यू फाइल उनके सामने रख दी. जिसे सामने से हटाते हुए उन्होंने कहा : मार्कशीट से ज्यादा विश्वसनीय हमारा ज्ञान होता है. मुझे वही देखना है तुममें. ये लो कागज और जितने शब्द कह रहा हूँ, लिख डालो। विद्वान संपादक ने हिन्दी-अंग्रेजी के कुल 25 शब्द लिखवाये जिनमें से 20 सही थे. महज पन्द्रह मिनट के साक्षात्कार में ही मुहर लग गई कि मैं पत्रकार बनने के योगय हूं.

लबे.गोया इकरार यह कि राडियानुमा पत्रकारिता के दौर में अब यह प्रयोग भले ही धूल चाट रहा हो लेकिन खामियाजा तो पत्रकारिता को ही उठाना पड़ रहा है. खैर.. उस दिन पत्रकारिता ने मुझे पाया था और मैंने स्वर्गीय पं.बबन प्रसाद मिश्र जी को. देश के ख्यातलब्ध पत्रकार, दैनिक आज की जनधारा के संस्थापक—संपादक स्व. पं.बबन प्रसाद मिश्र जी में यह क्षमता थी. एक ऐसी किताब जिसमें हमारे जैसे हजारों अध्याय जुड़े हैं. देश के प्रख्यात चिंतक वेद प्रताप वैदिक ने श्रद्धांजलि देते हुए कहा था कि मिश्रजी पत्रकारिता के युग की तरह जीए और उनके मूल्यों के आगे बाजार भी हारा.

मिश्रजी का जन्म 1938 को बालाघाट, मध्य प्रदेश में हुआ. तब देश नेहरू-गांधीजी के नेतृत्व में स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहा था. उन्होंने चार दशक से अधिक पत्रकारिता की तथा साहित्य और समाजसेवा से जुड़े रहे. वे मानते थे कि क्रांति शस्त्र से नही, विचारों से आती है. उन्होंने युगधर्म, दैनिक स्वदेश, नवभारत, दैनिक भास्कर, लोकमानस और आज की जनधारा समाचार—पत्र में बतौर संपादक कार्य किया. वे पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी सृजनपीठ के अध्यक्ष भी रहे. उन्हें राज्य शासन ने पं.सुंदरलाल शर्मा सम्मान, सृजन सम्मान तथा वसुंधरा सम्मान से सम्मानित किया था.

भलाई के प्रतीक हमारे बीच से ही जन्मते हैं जैसे कि मिश्रजी. उनसे सत्य को सुंदरता से व्यक्त करना सीखा जा सकता था. अपने हों या पराये, उनके सैद्धांतिक टूल्स ने कभी कोई सरहद नही बाँधी. समय-काल अनुरूप रिश्तों पर जो बर्फ जम जाती थी, मिश्रजी उसे पिघलाने में माहिर थे. बुढ़ापा उम्र का रेस्टहाउस और ज्ञान का भण्डार होता है पर इस उम्र में भी वे पौरूषवाद का बुनियादी पाठ साबित हुए. वे मुस्कुराते थे ताकि दूसरे मुस्कुरा सकें. उनकी लेखनी सामाजिक बुराईयां और अन्याय की जमकर और हमेशा निंदा करती रही. राष्ट्रवादी विचारक होने के बावजूद उन्होंने प्रोफेशनलिज्म का पूरा सम्मान किया.

दुर्लभ का धर्म ही होता है सुलभ होना. देश भर में उन्हें चाहने और मानने वाले लोग हैं. हर क्षेत्र की विभूतियों से उनके निजी संपर्क थे. नई पीढ़ी के लिए एक चिंतक, मनीषी और प्रेरणपुंज की तरह रहे. उनका संदेश था : हारिये ना हिम्मत, बिसारियों ना राम. सामाजिक कार्यक्रमों में भी उनकी यह पुकार हमेशा बनी रही कि हम सभी संस्कृति और संस्कार को बचाएं. फिलहाल यक्ष प्रश्न पत्रकारिता में घटती विश्वसनीयता और मूल्यों का है तब मिश्रजी द्वारा स्थापित आदर्श प्रतिमान जरूर याद किए जाने चाहिए. संभवत: यह देश का पहला उदाहरण था जब किसी संपादक ने बाजारी चुनौतियों के आगे झुकने या अपमानित होने के बजाय उससे जूझने का फैसला किया था.

आज के दौर में किसी संपादक से ऐसे हौसले या त्याज्य की उम्मीद आप नहीं कर सकते, खुद मुझसे भी नहीं क्योंकि हम जिन बवंडरों से जूझ रहे हैं, उसमें पत्रकारिता के मूल्य, खबरों की गुणवत्ता-विश्वसनीयता के साथ-साथ बाजार और प्रतिद्वंद्वियों के हमलों से खुद को बचाए रखना चुनौती है. आज तो पहले प्रचार, फिर समाचार और बाद में विचार के दौर का संकट है मगर जब तक मिश्रजी की दिखाई हुए पगडंडी है, आदर्श प्रतिमान हैं तब तक हम जैसों के भटकने का प्रश्न ही खड़ा नहीं होता! उनके सुपुत्र मनीष मिश्रा जी ने सही फरमाया कि पिता की तस्वीर से भी दुआएं आती हैं!

(लेखक आज की जनधारा अखबार तथा एकेजे न्यूज वेब मीडिया हाउस के संपादक हैं )