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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-सूचना समर में विश्वसनीयता का संकट

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-सूचना समर में विश्वसनीयता का संकट


यह सूचना समर का समय है। सूचनाओं की भरमार के बीच यह सवाल लाजमी हो गया है कि एक आदमी को कितनी सूचनाएं, कितनी जानकारी, कितना मनोरंजन चाहिए। ब्रेकिंग न्यूज, प्रायोजित न्यूज और टीआरपी के चक्कर में मीडिया खुद ही अपनी कब्र खोद रहा है। सवाल, जवाब और निर्णय सुनाने के साथ-साथ अब मीडिया अपनी प्रस्तुति को ड्रामेटाइज करने लगा है। ऐसा नहीं था कि प्रिंट मीडिया के दौर में पीत पत्रकारिता नहीं हो रही होगी या समाचार पत्र अपने हितों को नहीं साध रहे थे। निष्पक्ष पत्रकारिता करने वाले समाचार पत्रों के अपने व्यवसायिक हित भी थे, किन्तु उनकी खबरों में इतनी लम्पटता, अविश्वसनीयता या पूर्वाग्रह नहीं था, जितना की आज के टीवी चैनलों, न्यूज वेबपोर्टल पर दिखाई देता है। छोटे शहरों, कस्बो में भी मीडिया से जुड़े लोग जहां अपने व्यक्तिगत हितों के लिए छोटे-मोटे अफसरों, ठेकेदारों, भू-माफिया, रेत-माफिया से विज्ञापन के लिए या अन्य छोटे-मोटे काम के लिए अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े रहते, लाभ लेते हैं। किन्तु अब बड़े स्तर पर उस तरह अनर्गल झूठी खबरें देने की हिम्मत नहीं करते, जितनी महानगर के स्टुडियों में बैठें पत्रकार। गांव, कस्बों, छोटे शहरों में अभी भी समाज के प्रति लोगों की जवाबदेही बची हुई है। लोग क्या कहेंगे का डर बना हुआ है। अब धीरे-धीरे ये पर्दादारी खत्म हो रही है। बहुत से लोकल से लेकर ग्लोबल मीडिया समूह एक ही थैली के चट्टे-बट्टे की तरह नजर आ रहे हैं।

उनके पास मीडिया से इतर भी बहुत से काम है, उद्योग धंधे हैं, जिनके हितों का संरक्षण करने के लिए उन्हें बहुत सी खबरों को लाभ के नजरिये से दिखाना पड़ता है। इस समय पूरे देश का मीडिया दो खेमों में साफ नजर आ रहा है। मीडिया का एक बड़ा वर्ग सत्ताधारी दल और उसकी विचारधारा को आगे बढ़ाते दिखता हैं, तो दूसरा खेमा जनपक्ष की पत्रकारिता की बात कर रहा है। सभी जगह प्रमुख मुद्दा विश्वसनीयता और निष्पक्षता को लेकर है, जिस पर इस समय गहरा संकट दिखाई देता है। सामाजिक प्रतिबद्धता को तो मीडिया कब से अलविदा कह चुका है। आज का मीडिया जितना राजनीतिक आग्रहों से संचालित होता है, उससे कहीं अधिक प्रतिस्पर्धा और निजी लाभ के गणित तैयार होने लगे हैं। ऐसा लगता है, जैसे यह सदी अपने साथ सूचना-युद्ध के नाद को साथ लेकर आई है। सूचना तंत्र अब विश्व इकोनॉमी को संचालित कर रहा है या इसमें बड़ी भूमिका अदा कर रहा है।

इंटरनेट के आने से प्रिंट मीडिया को परोक्ष में कोई खतरा नहीं है, लेकिन खबर से लेकर विज्ञापन तक का स्वरूप बदला है। प्रिंट मीडिया का पुराना स्वरूप, संरचना, लेआउट से लेकर भाषा तक बदल चुकी है। इंटरनेट ने सेंसर जैसे अनिवार्य दखल को खत्म कर दिया है। भूमंडलीकरण दरअसल बहुराष्ट्रीय कंपनियों (एम.एन.सी.) की साम्राज्यवाद को लेकर एक प्रबल और प्रमुख महत्वाकांक्षा है। उन्होंने सिर्फ शहरों को नहीं, कस्बों और गाँवों की दबी-छिपी पूँजी को बाजार के चक्र में चलायमान किया है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपनी साम्राज्यवादी इच्छाओं को एक अनिवार्य व्यवस्था में तब्दील कर विश्वसनीय भी बना दिया है। उनके इस काम में मीडिया की प्रमुख भूमिका रही है। दरअसल, इन दिनों मीडिया देश की सामान्य जनता की इच्छा और संकल्प को इतनी चतुराई से बदल रहा है कि वे अनचाहे उस बाजार के हवाले हो रहे हैं, जो पहले ही मीडिया के अधिकांश हिस्सों को हथियाए हुए हैं।

नैतिकता की सबसे ज्यादा दुहाई देने वाले मीडिया को अब लोकतंत्र की चिंता नहीं है। संपादक अब विचारक नहीं, मैनेजर की जरूरत पूरी कर रहा। जो देश की नई आर्थिक अवधारणाओं के चलते भूमंडलीकरण की लहर में खबर को एक उत्पाद में बदलने में निर्लज्ज और बेहिचक कोशिश करने में सफल हो रहा है। इस नए दौर के लोकतंत्र में मीडिया का केंद्रीय महत्तव बढ़ गया है। राजनीति मीडिया पर आधारित है और मीडिया अपनी इस सत्ता-शक्ति का अपने व्यापार हित में पूरा लाभ उठा रहा है। वह राजनीति में नियामक की स्थिति में आ गया है। मीडिया के सत्ताधिकार की इच्छा ने राजनीति के चरित्र को संचालित करने या बनाने-बिगाडऩे का ऐसा संकल्प ले लिया है, जो एक ओर सामान्य जन में विश्वसनीय है तो दूसरी ओर व्यापार-लाभ के दरवाजे खोल रहा है। यही कारण है कि राजनीति की मर्यादा और नैतिकता टूटने में आज जरा भी देर नहीं लगती है। आज राजनीति और मीडिया के बीच एक ऐसा गठबंधन है, जो गरम बहस और एक उत्तेजक लड़ाईनुमा साक्षात्कार के नाटक के साथ एक-दूसरे के हित साधन है। मीडिया ने स्वयं को जनमानस तक राजनीति को पहुँचाने का निर्वैकल्पिक रास्ता बना दिया है। वह राजनीति को सूचना में बदलकर व्यापार का हिस्सा बना रहा है। मीडिया ने एक ऐसा यथार्थ रचा है, जो आपकी मरजी मुताबिक उसे स्थिर और अस्थिर बनाता है। मीडिया को यदि उद्योग रूप से बाहर लाया जाए और उसकी बाजार में दाखिल होने की इच्छा को खत्म किया जा सके, तो मीडिया एक बड़े सकारात्मक रूप में और बड़ी शक्ति के रूप में नजर आएगा।

सामान्य पाठक या कहें जनता के प्रति पवित्र कही जानेवाली पत्रकारिता के प्रति उसने अपनी जवाबदेही खत्म कर ली है। संपन्न वर्ग और राजनीतिज्ञों के चेहरे पर इस नई पत्रकारिता से उपजे भय से आज की पत्रकारिता सार्थक आनंद नहीं, एक निर्मम दंभ से भर जाती है। इसीलिए आज चाहे प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, दोनों में इस भय के व्यावसायिक उपयोग के लिए प्राय: भय निर्माण भी किया जाने लगा है।

२४3७ खबरों की बात करने वाले टीवी न्यूज़ चैनल खुद ही ख़बर बन गये हैं। टीआरपी के झगड़े के साथ-साथ टीवी चैनलों पर आज आपसी गलाकाट स्पर्धा का देखते मिलती है।
लोकप्रियता तय करने वाले टीआरपी सिस्टम व उसके खेल के बारे में किसी को ज्यादा कुछ नहीं पता। जिस चैनल की जितनी टीआरपी, उसके पास उतने ही अधिक विज्ञापन। टीवी मीडिया अपनी अस्सी प्रतिशत इन्कम इन्हीं विज्ञापनों के माध्यम से ही प्राप्त करता है। इसलिए टीवी के प्रत्येक कार्यक्रम में संबंधित विषय कम और विज्ञापनों की भरमार हमको ज्यादा दिखाई देती है।
टेलीविजन रेटिंग प्वायंट्स (टीआरपी) मैनिपुलेशन रैकेट मामले में मुंबई पुलिस ने रिपब्लिकन टी वी के अलावा दो बड़े विज्ञापन एजेंसियों को भी इस मामले में समन किया गया है। पुलिस के मुताबिक, इस मामले में दो मराठी चैनलों के मालिकों समेत कुल चार लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है।

टेलीविजन रेटिंग पॉइंट्स (टीआरपी) किस टीवी चैनल को कितना देखा जा रहा है यह मापने का एक पैमाना है। इसके दायरे में मनोरंजक, ज्ञानवर्धक और न्यूज सभी तरह के कार्यक्रम दिखाने वाले चैनल आते हैं। टीआरपी को मापने के लिए बीएआरसी नामक संस्था अधिकृत है। यह संस्था पूरे देश में कुछ घरों को चुनकर उनके टीवी सेट में व्यूअरशिप मापने के उपकरण लगाती है, जिन्हें बैरोमीटर कहते हैं। बीएआरसी ने पूरे देश में करीब ४५,००० घरों में ये बैरोमीटर लगाए हुए हैं। कौन सा चैनल कितना लोकप्रिय है, टीआरपी ही इसका फैसला करती है। लोकप्रियता के आधार पर चैनलों को विज्ञापन मिलते हैं और उन्हीं से चैनलों की कमाई होती है।चैनल इस कमाई और चैनलों की आड़ में अपने उधोग धंधों का संरक्षण के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं । आक्रमक शैली में एंजेडा आधारित इस पत्रकारिता में पैसा जरूर मिल जायेगा लेकिन खबरों थी विश्वसनीयता खत्म हो जायेगी ।