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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - वैध अवैध के बीच फंसता आम आदमी

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - वैध अवैध के बीच फंसता आम आदमी

-सुभाष मिश्र

रोटी, कपड़ा, मकान मनुष्य की बुनियादी आवश्यकता है। हमारा संविधान भी हमें भोजन, रोजगार और आवास का अधिकार देता है, यही वजह है कि कल्याणकारी सरकारें किसी को भूखा नहीं मरने देती। कहीं कोई भूख से मर जाए तो पूरी सरकार इस बात को सिद्ध करने पर लग जाती है कि आदमी की मौत भूख से नहीं हुई है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उसका पेट भरा और घर में अनाज की उपलब्धता बताना, अच्छे प्रशासन की निशानी है। सरकारें किसी को बिना कपड़े के नहीं रहने देती और आवासहीनों के लिए यथासंभव आवास की व्यवस्था कराती है। प्रधानमंत्री आवास योजना के जरिये शहरीय और ग्रामीण इलाकों में पक्के मकान भी बने है। तेजी से बढ़ते शहरीयकरण बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य और लाइफ स्टाईल साथ ही गांव से रोजगार की तलाश में शहरों की आने वाले लोगों की वजह से शहरों में वैध-अवैध कालोनियों की संख्या भी बढ़ी है।

सरकारी तंत्र का सबसे निचला कर्मचारी या यूं कहें गांव-गांव में सरकार का चेहरा गांव का कोटवार, पटवारी, ग्रामसेवक होता है। यही लोग अपने गांव में सरकार की छवि बनाते बिगाड़ते हैं। सरकारी, सार्वजनिक सूचना की मुनादी करने वाले कोटवारों ने सरकारी जमीन बेच दी और किसी को कानो कान खबर नहीं हुई। छत्तीसगढ़ के 515 गांवों में सेवा भूमि के नाम से कोटवारों को आबंटित जमीन में से 153 एकड़ जमीन दूसरो को बेच दी गई और शहरीय क्षेत्र में होने के कारण इन जमीनों पर कालोनियां बन गई, लोगों ने अपने मकान बना लिया। जिन लोगों ने कालोनाईजर से प्लाट, मकान खरीदा है, उनमें से अधिकांश लोग निम्न आयवर्गीय या मध्यम आयवर्गीय है। सरकारी अमला अब अचानक से जागा है और कोटवारों को मिली सेवा भूमि पटवारी हल्का नंबर के बी-1 खसरे में भूमि अहस्तांतरित दर्ज करना शुरू कर दिया है। ऐसा करने से भवनों का पंजीयन किसी दूसरे के नाम से नहीं हो सकता। कोटवारों को मिली सेवा भूमि में रायपुर शहर की बड़ी कालोनी दुबे कालोनी, हीरापुर, विधानसभा, सेजबहार, डूंडा, बोरियाकला सहित बहुत से इलाके शामिल है। अकेले रायपुर जिले की चार तहसील रायपुर, आरंग, अभनपुर और तिल्दा के ग्रामों की जमीन बेचने का मामला सामने आया है। ऐसे मामले पूरे प्रदेश में सामने आयेंगे। यह मामला भी तब सामने आया है जब हाईकोर्ट ने अपने एक आदेश में पूर्व में कोटवारी जमीन के लिए कराए गए पंजीयन को निरस्त करने की प्रक्रिया अपनाने के आदेश दिए।

सरकारी मशीनरी और शासन-प्रशासन में जमीनों के प्रस्तावित उपयोग, योजना से जुड़े बहुत से लोगों ने प्रारंभिक सूचना और जानकारी के आधार पर उन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर जमीनों की खरीद फरोख्त की है जहां से प्रमुख सड़कें निकलने वाली थी, या सरकार की कोई बड़ी योजना लाने वाली थी। बहुत सारे प्रभावी लोगों ने हाउसिंग बोर्ड, रायपुर विकास प्राधिकरण आदि संस्थाओं की प्रसारित टाउनशीप, कालोनियों के निर्माण से पहले ही अपने परिचितों, रिश्तेदारों के नाम पर जमीने कौडिय़ो के मोल में खरीद ली। बाद में जमीने करोड़ों रुपये की हो गई।

छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से बहुत से लोग पिछले बीस सालों में अमीर हुए हैं, उसमें उन लोगों की भरमार है जो जमीन की खरीदी-बिक्री, सौदेबाजी से जुड़े हुए थे। नया रायपुर में प्रसारित टाउनशीप को देखते हुए भी प्रभावशाली लोगों ने पहचान, पहुंच और सरकारी सूचनाओं के आधार पर ऐसे सौदे किए जो भविष्य में उन्हें मालामाल कर दें। किसान आंदोलन के जरिये अपनी फसल का उचित मूल्य मांग रहा किसान जिसे अपनी जमीन बिकने की चिंता है, वह इस तरह की सौदेबाजी भी ठगा गया है।

उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए बनाई गए रेरा प्राधिकरण के पास आने वाली शिकायतों में रायपुर सबसे ऊपर है। समय पर मकान और पर्याप्त सुविधाएं न देने के मामले में रेरा प्राधिकरण के पास राजधानी के बड़े-बड़े बिल्डरों के खिलाफ शिकायतें आई हैं।

किसी भी भूमि का डायवर्सन करायें, लैंडयूज बदलवाये, कॉलोनी का लाईसेंस लिए बिना कालोनी बनाने वाले बिल्डरों पर नकेल कसने के लिए रेरा प्राधिकरण ने बैंकों से कहा है कि जब तक बिल्डर रेरा प्राधिकरण में अपने प्रोजेक्ट का पंजीयन नहीं करा लेता है, उसका कोई लोन स्वीकृत नहीं किया जाएगा। इसके साथ ही उपभोक्ताओं को भी ध्यान देने होगा कि वह केवल रेरा में रजिस्टर्ड बिल्डर से ही खरीदारी करें।

एक अदद सस्ते मकान की चाहत रखने वाले लोगों ने जहां कहीं भी प्लाट मिला, फ्लैट मिला, थोड़ा सस्ता देखकर खरीद लिया। रायपुर की बुहत सी कालोनियों में लोग अपने प्लाट, फ्लैट, मकान के लिए चक्कर काटते देखे जा सकते हैं। नरवा, गरवा घुरुवा, बारी के लिए बिलासपुर के आरक्षित जमीन पर भू-माफिया द्वारा कब्जा कर 4 से 6 मंजिला फ्लैट बनाकर करोड़ों में बेचने का मामला सामने आया है। ऐसा नहीं है कि शासन-प्रशासन ने इन बिल्डरों, भू- माफियाओं पर नकेल  डालने की कोशिश नहीं की हो। अपनी पहुंच, पैसे और सरकारी कागजों में हेराफेरी की वजह से ये लोग आमजन को चूना लगाने में कामयाब हो जाते हैं। सरकारी- जमीन पर अवैध कब्जा, धार्मिक स्कूलों, सार्वजनिक भवनों का निर्माण कर उसके बहाने जमीने हड़पने का खेल पुराना है।