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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-देवी पर्व में बेटियों के लिए सौगात

 प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-देवी पर्व में बेटियों के लिए सौगात


अभी हमारे देश में दैवीय पर्व चल रहा है। इस दैवीय पर्व में लड़कियों के विवाह की आयु को 18 वर्ष से बढ़ाकर लड़कों की आयु के समान 21 वर्ष करने की बात की जा रही है, जो कि लड़कियों के लिए एक बहुत ही सकारात्मक निर्णय होगा। देवी पर्व पर सरकार की ओर से आई यह खबर बेटियों के लिए एक अच्छी सौगात है। बहुत सारे घरों में औरतों को केवल बच्चा पैदा करने की मशीन और घर को संभालने वाली की तरह देखा जाता है। बहुत सी लड़कियां कम उम्र में मां बनने के कारण प्रसूति के समय मौत के मुंह में समा जाती है। कुछ लड़कियां बाल विधवा के रूप में ताजिंदगी बहुत ही दुख पाती है। उनका सारा सौंदर्य, कलर उनसे छिन लिया जाता है। खेलने की उम्र में वे सफेद कपड़ों में दिखाई देती है।

हमारे यहां के कानून में लड़कों के लिए शादी की उम्र 21 तथा लड़कियों के लिए 18 वर्ष से ऊपर निर्धारित है। इससे कम उम्र पर विवाह करना बाल विवाह के अंतर्गत अपराध है। अब जब लड़का-लड़की में धीरे-धीरे शिक्षा, रोजगार के अवसर और रहन-सहन, सोच के स्तर पर अंतर को पाटा जा रहा है तब यह सवाल भी जरूरी है कि विवाह की उम्र में अंतर क्यों हो? देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र में बदलाव की बात कह रहे हैं। सरकार ने जया जेटली की अध्यक्षता में एक टास्क फोर्स गठित की है जिसकी रिपोर्ट आते ही इस बारे में निर्णय लिया जायेगा। इस मामले में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट पहले ही पूछ चुका है कि लड़का-लड़की की विवाह हेतु न्यूनतम आयु में अंतर क्यों? इस कानून के आ जाने से बालविवाह के चंगुल में फंस जाने वाली लड़कियों को निश्चित ही राहत मिलेगी।

सामान्यत: परंपरागत प्राचीन एवं धार्मिक संस्कार वाले परिवारों में लड़की के रजस्वला (मासिक धर्म) होने के बाद यह मान लिया जाता है कि लड़की अब सयानी हो गई है और उसके लिए योग्य वर खोजकर उसका विवाह करने की तैयारी प्रारंभ हो जाती है। मुस्लिम परिवारों में भी लड़की के रजस्वला होने पर निकाह की परंपरा है और मुस्लिम पर्सनल ला में इसका प्रावधान है। पूरे देश में एक समान विवाह आयु तय होने से निश्चित रूप से कुछ मुस्लिम धार्मिक संगठन और परंपरागत हिन्दू परिवार भी इसका विरोध कर सकते हैं।

शादी की उम्र में बदलाव के बहुत से मायने हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में और गरीब अशिक्षित तबको में सामाजिक भेदभाव, असुरक्षा और लड़की को पराया धन समझने की वजह से बहुत से माता-पिता लड़कियों का विवाह छोटी उम्र में ही कर देते हैं। कुछ जगहों पर बचपन में विवाह करके कुछ साल बाद गौना कराकर लड़की को ले जाने की प्रथा भी है। हर साल अक्षय तृतीया को ग्रामीण क्षेत्रों में बाल विवाह का चलन है जिसे सरकार कानून के जरिये, सामाजिक जागरुकता के माध्यम से रोकने की कोशिशें करती है। इन सबके बावजूद बाल विवाह अभी तक पूरी तरह से रुके नहीं हैं। लड़कियों के पालन-पोषण, शिक्षा-दीक्षा, रहन-सहन में भेदभाव भारतीय समाज में आम बात रही है।

लड़कों को कुल का दीपक समझने, वंश को आगे बढ़ाने वाला मानकर उसे जितने अवसर दिये जाते रहे हैं, उतने अवसर लड़कियों को नहीं मिलते। लड़कियों को जब भी अवसर मिले हैं, बराबरी का हक मिला है, लड़कियों ने लड़कों से बेहतर करके दिखाया है। हमारे देश में कम उम्र में विवाह होने और लड़की के मां बनने से उसकी डिलीवरी के समय मृत्यु की संभावना बनी रहती है। वहीं जो बच्चा पैदा होता है, उसके भी कमजोर होने की संभावना ज्यादा होती हैं। ये अच्छी बात है कि केंद्र सरकार द्वारा गठित टास्क फोर्स ने शादी की उम्र को शिशु मृत्यु दर, जच्चा मृत्यु दर, प्रजनन दर और लिंगानुपात जैसे मानकों से जोड़कर देखा है। ऐसा करने से समाज के अलग-अलग वर्ग में कम उम्र में शादी की प्राचीन परंपराओं पर कानूनन रोक लगेगा। यूनिसेफ के आंकड़ों के अनुसार अभी भी हमारे देश में 18 वर्ष से कम आयु वर्ग की 15 लाख से अधिक लड़कियों का बाल विवाह होता है।

स्वतंत्रता दिवस के भाषण में, प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी द्वारा मातृ-मृत्यु दर कम करने और पोषण स्तर में सुधार के साधन के रूप में महिलाओं के लिए विवाह की न्यूनतम कानूनी आयु 18 वर्ष से बढ़ाकर 21 वर्ष करने का आह्वान किया। वर्तमान में लागू यदि केंद्र सरकार यह कानून लागू कर बाल विवाह अधिनियम में परिवर्तन करती है तो यह अपने आप में ऐतिहासिक निर्णय होगा। इसके पहले 42 वर्ष पूर्व विवाह की उम्र में बदलाव किया गया था। 1978 में जब लड़कों के लिए शादी की उम्र 21 से बढ़ा दी गई थी और लड़कियों के लिए 18 थी। इसका कारण जनसंख्या पर अंकुश लगाना था।
2015-16 में, 63 फीसदी युवा महिलाओं की शादी 21 साल की उम्र से पहले कर दी गई थी। कुछ लोगों का मानना है कि महिलाओं के लिए 18 से 21 वर्ष की आयु बढ़ाने से युवा माता-पिता की इच्छा के खिलाफ शादी करने की प्रतिक्रिया बढ़ेगी और यौन गतिविधि का अपराधीकरण होगा। लोगों का कहना है कि शादी की उम्र की बजाय स्कूली शिक्षा पर जोर दिया जाए और शादी की उम्र में देरी के लिए नौकरी के अवसरों तक पहुंच हो और कम उम्र की शादी को रोकने और कुपोषण से लडऩे के लिए गरीबी दूर की जाए। बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि 18 से 21 वर्ष की महिलाओं के लिए विवाह योग्य आयु में वृद्धि करके सरकार उन वास्तविक मुद्दों को सुलझाने पर ध्यान केंद्रित करने का अवसर याद कर रही है जो पहली बार बाल विवाह को जन्म देते हैं।

सरकार का मानना है कि यह परिवर्तन लड़कियों और युवा महिलाओं को सशक्त करेगा, शिक्षा तक उनकी पहुंच बढ़ाएगा और शिशु मृत्यु दर और मातृ मृत्यु दर में सुधार करेगा। बाल विवाह में महिला के यौन और प्रजनन स्वास्थ्य को खतरे में डालने की संभावना है। महिला जीवन साथी के पास अकसर सुरक्षित यौन संबंध और गर्भनिरोधक प्रथाओं के लिए स्थिति और ज्ञान की कमी के कारण एचआईवी या अन्य यौन संचारित संक्रमणों के साथ-साथ कम उम्र में गर्भावस्था की संभावना बढ़ जाती है।

जहां तक विवाह की बात है तो व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा, इगो और आपस में समझ, समर्पण और सहभागिता की कमी के कारण दाम्पत्य  में अलगाव के प्रकरण बढ़े हंै। विवाह नामक संस्कार धीरे-धीरे कमजोर हो रही है। बहुत से लोग एकल माता-पिता बनने की दिशा में बढ़ रहे हैं। लड़कियों के पढऩे-लिखने और समाज के आई जागरूकता के कारण बाल विवाह की दर में कमी आई है।

चौथे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएचएफएस 2015-16) के अनुसार, देश में जल्दी शादी में गिरावट आई है। 20-14 वर्ष की आयु में 27 प्रतिशत महिलाओं ने 2015-16 में 18 साल की कानूनी उम्र से पहले शादी की, तुलना में 2005-06 में 47 प्रतिशत के साथ। महिलाओं के लिए 20-49 वर्ष की पहली शादी में औसत आयु भी 2015-16 में 19.2 से बढ़कर 2005-06 में 17.2 वर्ष हो गई।

दाम्पत्य में आ रहे तनाव का आलम यह है कि हालिया घटनाएं छत्तीसगढ़ के राज्य प्रशासनिक सेवा के एक अधिकारी ने अपनी पत्नी को पीटा, बच्चों को बंधक बनाया और फिर महिला आयोग में जाकर बदतमीजी की। इस तरह मध्यप्रदेश के एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी ने अपनी पत्नी को बुरी तरह पीटा, जिसका वीडियो दानी के भारतीय सेवा में कार्यरत लड़के ने बनाकर वायरल किया। ये और ऐसी घटनाएं बताती है कि दाम्पत्य जीवन में भी बहुत तनाव है। लोग एक-दूसरे के साथ रहने में असहज है। ऐसी सारी घटनाओं में औरतें ही ज्यादा प्रताडि़त होती है। विवाह की आयु बढऩे से लड़कियों में समझ, साहस, शिक्षा और स्वावलंबन बढ़ेगा और उनकी प्रताडऩा कम होगी।