कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः दबे पाँव बढ़ते हैं कद्दू

कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः दबे पाँव बढ़ते हैं कद्दू


इतने मोटे-तगड़े कद्दू

लगें देखने में ये फद्दू

कुछ भोंदू-से

कुछ तोंदू-से

बड़े-बड़े-से ढोल

इनकी चितकबरी है खोल


बीज छिपा है इनके भीतर

जिससे ये अपनी बेल बढ़ाकर

घर के छप्पर पर चढ़ते हैं

हरे-हरे पत्तों में छिपकर 

दबे पाँव बढ़ते हैं


चुपके-चुपके वजन बढ़ाकर

घर के खपरे फोड़ें

जो ढोता है इनको सिर पर

उसकी कम्मर तोड़ें

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कद्दू के आगे छोटी दिखतीं

खरबूजों की फाँकें

खट्टे-मीठे आम सभी

कद्दू का मुँह ताकें

कद्दू देखें लाल-लाल जब

तरबूजों की आँखें

पीले और केसरिया कद्दू

आपस में मुँह ताकें