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JNU गौरवशाली इतिहास रहा है जेएनयू का, उसके विवाद और इतिहास पर एक नजर

JNU गौरवशाली इतिहास रहा है जेएनयू का, उसके विवाद और इतिहास पर एक नजर

आशिका कुजूर

 
देश में नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद से जेएनयू यानी जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय कुछ ज्यादा ही चर्चा में है। राष्ट्रवादी सोच के संगठन और कुछ बुद्धिजीवी इसे राष्ट्र विरोधी गतिविधियों का केंद्र बताते हैं। उन्हें लगता है कि शहरी नक्सलियों का यह अड्डा है। पिछले कुछ सालों में कन्हैया-अफ़जल एवं उनके साथियों के द्वारा कथित राष्ट्र विरोधी नारे लगाने की बात हुई तो जेएनयू पर काफी हमले हुए। जेएनयू की स्वायत्तता को लेकर भी सवाल खड़े किए गए। मीडिया में लगातार जेएनयू के खिलाफ एक ऐसा वातावरण बनाने की कोशिश जारी है जो जेएनयू को एक राष्ट्र विरोधी अराजक लोगों का संस्थान बता रहा है जबकि हकीकत इसके बिल्कुल परे है।

देश के हर प्रतिभाशाली विद्यार्थी की पहली पसंद रहा है जेएनयू। सवाल यह है कि यहाँ ऐसा क्या है जो उसे दूसरे विश्वविद्यालयों से अलग दिखाता है। यहां के छात्र संगठन पर ज्यादातर वामपंथी सोच वाले संगठनों से जुड़े विद्यार्थियों का कब्जा रहा है। वर्तमान सरकार में विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण जेएनयू से है। देश की सर्वोच्च नीति निर्माण संस्था नीति आयोग जो कि पूरे देश के लिए योजना निर्माण में सबसे बड़ी संस्था हैं उसके सीईओ प्रधानमंत्री मोदी प्रिय अधिकारियों में से एक अमिताभ कांत, जेएनयू से  हैं। स्वामी विवेकानंद फॉउंडेशन जो कि देश का इस समय सबसे जाना माना थिंक टैंक है ,उसके वर्तमान अध्यक्ष जेएनयू से अरविंद गुप्ता हैं जो इसके पहले भारत सरकार के राष्ट्रीय सुरक्षा उप सलाहकार थे। स्वामी विवेकानंद इंटरनेशनल फॉउंडेशन के इंडिया अध्यक्ष जेएनयू से हैं। आईएएस दीपक रावत, आईपीएस मनु महाराज जेएनयू से है। जेएनयू को राष्ट्रपति से बेस्ट यूनिवर्सिटी का विशेष अवार्ड मिला हैं तो वैंकेया नायडू इसे एक्सीलेंस का पर्याय बताया है। भारत सरकार द्वारा लगातार इसे सर्वश्रेष्ठ यूनिवर्सिटीज़ में कभी पहले, कभी दूसरे तो कभी तीसरे पायदान पर रखती है। 

देश का बहुत सा मीडिया जेएनयू का पर्याय बनाये जा रहे कन्हैया कुमार, अफजल और उमर खालिद पर फोकस करता है लेकिन नक्सल से लडऩे वाले आईपीएस संजुक्ता पराशर, देश के किसी भी राज्य के सीएम की पहली महिला सुरक्षा अधिकारी आईपीएस (असम मुख्यमंत्री) सुभाषिनी शंकर का नाम नही बताता है। आईएएस प्रशिक्षण अकादमी, मसूरी से मास्टर इन पब्लिक मैनेजमेंट की डिग्री देश के सारे आईएएस अधिकारियों को जेएनयू से मिलता है, साथ ही राष्ट्रीय रक्षा अकादमी वालो को डिग्री भी जेएनयू से ही मिलता है। पूर्व आईबी चीफ पश्चिम एशिया में काउंटर टेररिज़्म इंवॉय सैयद आसिफ इब्राहिम, हिमाचल प्रदेश के अतिरिक्त मुख्य सचिव अली रज़ा रिज़वी जैसे जेएनयू से पढ़े मुस्लिम अधिकारियों को मीडिया हाइलाइट करके नहीं दिखाती है।

जेएनयू ही क्यों?

जेएनयू देश के बहुत से युवाओं का खासकर जो लोग गरीब तबके से आते है और प्रतिभाशाली हैं, ऐसा प्लेटफार्म है जो उन्हें अपनी तो गाइड से लेकर थीसिस जमा करने तक कम-से-कम 2 लाख रुपये का एक्स्ट्रा खर्च आयेगा। जेएनयू में यह खर्च तो बचेगा ही, साथ ही आपके शोध को एक ग्लोबल स्कोप मिलेगा। स्वाभाविक है कि जेएनयू जैसी यूनिवर्सिटी में उस घर के बच्चे भी पीएचडी कर पाते हैं, जिनके पिताजी को पीएचडी का मतलब भी ठीक से पता नहीं होता, वे बस इतना समझते हैं कि बेटा अब नाम में डॉक्टर लगा सकेगा। यानी उस परिवार की पूरी पीढ़ी बदल जाती है। जेएनयू की लाइब्रेरी, कैंटीन, मेस का खाना यहां के विद्यार्थियों को कभी घर की याद नहीं सताने देता। जेएनयू समाज ने एक आम समझ भी विकसित की है कि लड़की और लड़के के बीच सिर्फ यौनांगों का फर्क होता है। बाकी, दिल, दिमाग, आत्मा-परमात्मा सब एक है। यही कारण है कि लड़कियां यहां ज्यादा फ्री होकर पढ़ती, घूमती और रहती हैं।

हाल ही में विवादों में घिरा फीस बढ़ोतरी का मामला -

आंदोलन की सच्चाई क्या है और इसे कुछ इस तरह से सोशल मीडिया पर यह प्रचारित किया जा रहा है कि जेएनयू में 10 रुपये/महीने बेड और 20 रुपये/महीने रूम उपलब्ध है। उसे 300 रुपये/महीने और 600 रुपये/महीने  किये जाने पर लोग सही ठहरा रहे हैं। जेएनयू, एएमयू, बीएचयू आदि विश्वविद्यालय को एक विजन के साथ बनाया गया है। विजन न्याय की अवधारणा का है, जब तक देश में एक भी आदमी गरीबी रेखा से नीचे है, अगर उसके अंदर सामान्य टैलेंट है तो उसे भी पढ़ाई के उचित अवसर मिलें। आज अचानक से 1800 रुपये/महीने का सर्विस चार्ज अलग से लगाया गया है, यह पहले शून्य था। यानी एक छात्र पर सालाना 23 हजार के लगभग का बोझ यहीं बढ़ जाता है।

अगर बात करें कि जेएनयू ने क्या दिया है देश को तो कसाब को फांसी दिलाने वाले चले अभियान 'ऑपरेशन एक्स ' के प्रणेता और महाराष्ट्र के पूर्व एडिशनल चीफ सचिव अमिताभ राजन जो कि जेएनयू से सोशियोलॉजी में पीएचडी हैं। नीदरलैंड के राजदूत वेणु राजमोनी, कोमोरोस के राजदूत अभय कुमार समेत 15 से ऊपर देशों के राजदूत, उच्च इंवॉय जेएनयू से हैं। हाल ही में नोबेल जैसे दुनिया के अतिप्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त करने वाले भारतीय अभिजीत बनर्जी भी जेएनयू से थे। वर्ल्ड बैंक के अर्थ विशेषज्ञ रंजीत नायक, नाबार्ड के पूर्व निर्देशक, आरबीआई के पूर्व डिप्टी डायरेक्टर हारून रशीद खान जैसे अर्थ विशेषज्ञ जेएनयू से है। जेएनयू का अकादमी योगदान इस बात से जाना जा सकता है कि इतिहास, समाजविज्ञान, भाषा, साहित्य संस्कृति, विदेश नीति के ढेर सारे लेखक एवं विशेषज्ञ जिनकी किताबे न सिर्फ भारत के विश्वविद्यालयों में बल्कि यूपीएससी की परीक्षाओं के लिए भी पढ़े जाते हैं।

जेएनयू ने पिछले दस सालों में कई अवार्ड अपने नाम किये हैं। जैसे अभिजीत बनर्जी को अर्थशास्त्र के लिए नोबेल पुरस्कार 2019 ,प्रो एल रामनाथन को हियोशी अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण पुरस्कार 2019, प्रोफेसर दिनेश मोहन को क्लेरिएटिव एनालिटिक्स इंडिया रिसर्च एक्सीलेंस अवार्ड 2019, प्रोफेसर एन जे राजू को नेशनल जिय़ो साइंस अवार्ड 2019, किसी भी साहित्यकार को रूसी भाषा एवं साहित्य पर काम करने के लिए रूस का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय अवार्ड पुश्किन मेडल जेएनयू की प्रोफेसर मीता नारायण को मिला। डॉ दीपक गौर को 2017 का देश मे विज्ञान क्षेत्र का सबसे बड़ा अवार्ड शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार प्राप्त हुआ।

प्रोफेसर ऊमु सलमा बावा को यूरोपियन कमीशन का प्रतिष्ठित अवार्ड मिलात्र. प्रोफेसर गिरीश नाथ झा को संस्कृत भाषा के लिए अति प्रसिद्ध दत्त पीठ अस्थाना अवार्ड, शोधार्थी स्नेहा राय को अमेरिका में कार्ल स्टॉर्म इंटरनेशनल डाइवर्सिटी अवार्ड और अमेरिका की प्रोटीन सोसायटी ट्रेवल अवार्ड जो कि मॉन्ट्रियल कनाडा में दिया गया। डॉक्टर ज्योति अटवाल (इतिहास विभाग जेएनयू) को आयरलैंड में जेंडर और ट्रांसनेशनल हिस्ट्री पढ़ाने हेतु पांच साल के लिए नियुक्ति ,प्रोफेसर दिनेश मोहन मिसिसिपी, अमेरिका में तीन साल के लिए सहायक प्रोफेसर नियुक्त। डॉक्टर सुनील कठेरिया को इनोवेटिव यंग बायोटेक्नोलॉजिस्ट अवार्ड मिला है। जेएनयू की उपलब्धियों की बात करें तो इसकी फेहरिस्त काफी लम्बी है। वर्तमान मोदी सरकार के अनुसार ही यह देश के सर्वश्रेष्ठ यूनिवर्सिटीज में से है।