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II प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की विशेष टिप्पणी : मन की व्यथा मत कहिए, मन की बात सुनिए

II प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की विशेष टिप्पणी : मन की व्यथा मत कहिए, मन की बात सुनिए

मन की व्यथा मत कहिए, मन की बात सुनिए

  • सुभाष मिश्र

    यह मोनो लॉग का समय है। यह मन की बात का समय है। यह लोगों को इस तरह के भ्रम में रखने का समय है कि हमारे देश के नेता सबसे बात कर रहे हैं। दरअसल वे सबसे बात करते हुए अपनी ही बात कर रहे होते हैं। उन्हें वही सुनना पसंद है, जो वे चाहते हैं। हर चीज को मुफ्त में पाने की लालसा रखने वाली भारत की जनता भी वही सब देखना, सुनना चाहती है, जो मुफ्त में उपलब्ध है। वह अमेरिका, ब्रिटेन की तरह भुगतान करके बीबीसी जैसे टीवी चैनल, अखबार नहीं देखना व लेना चाहती, जो स्वतंत्र अपने पाठकों, दर्शकों के भरोसे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होकर अपनी बात कह सके। गोदी मीडिया के इस दौर में दर्शक, पाठक कब उपभोक्ता के साथ-साथ कार्यकर्ता और भक्त में तब्दील हो रहा है, उसे पता ही नहीं चलता। अच्छा होता​ कि इस समय एक तरफा की जा रही 'मन की बात' की बजाय लोगों के मन की व्यथा को सुना जाता।

    संवाद हमेशा दोतरफा होता है। एक तरफा प्रलाप या प्रशस्ति होती है। मोदीजी को लोगों के मन की व्यथा सुनने की नही, अपने मन की बात कहने की आदत है। वे सवालिया मीडिया को अपने आसपास भी नहीं फटकने देते हैं। आप अपने मन की व्यथा मत कहिए, केवल  मन की बात सुनिए। जब से कोरोना कालखड प्रारंभ हुआ है, लोगों की रूचि मीडिया में कुछ ज्यादा बढ़ गई है। गृहणियां जो सामान्यत: दोपहर में सास-बहू के सीरियल, यूट्यूब पर खाने की रेसीपी या फिल्मी गॉसिप देखा करती थीं, अब कोरोना से जुड़ी खबरें देखने, सुनने में मग्न हैं। बाहर की किसी चीज को नहीं छूना है' के सूत्र वाक्य ने हमें वर्चुअल दुनिया के ज्यादा नजदीक ला दिया है। अब एक अदद अच्छे वाईफाई नेटवर्क के भरोसे लॉकडाउन में रहा जा सकता है, जिया जा सकता है। ये सबको मालूम हो चुका है। हमारे नेता शुरू से ही मीडिया के महत्व को समझते थे। गांधीजी, नेहरूजी से लेकर शहीद भगत सिंह सभी किसी न किसी रूप में अखबार से जुड़े रहे हैं। अकबर इलाहाबादी का एक शेर बहुत मशहूर था-

    खिंचो ना कमानो को, ना तलवार निकालो
    जब तोप मुकाबिल हो, तो अखबार निकालो।

    अब अखबार निकालना कोई सरल बात नहीं रही। तेजी से बंद हो रहे अखबार और बेरोजगारी झेल रहे पत्रकारों से पूछो तो बतायेंगे कि 'बहुत कठिन है डगर पनघट की' आजादी के बाद भी मीडिया से राजनीति में आवाजाही बनी रही। राज्यसभा और विधान परिषद तो बनाई ही इसीलिए गई ताकि समाज के अलग-अलग क्षेत्र के लोगों को यहां लाकर प्रतिनिधित्व दिया जा सके। जैसे-जैसे पूंजी का प्रभाव बढ़ा, ग्लैमर बढ़ा, जातिगत, क्षेत्रीय समीकरण प्रभावी हुए तो राज्यसभा, विधान परिषदों में भी इसका असर दिखने लगा। पहले मीडिया के जरिये लोग राजनीति में जाते थे। अब राजनीति के साथ-साथ मीडिया में आ रहे हैं, पर यह आना खुलेआम नहीं है। मीडिया में आने के बहुत से चोर दरवाजे हैं, जिसमें सबसे मजबूत और विश्वसनीय दरवाजा कारपोरेट पूंजी है या सत्ता प्रतिष्ठिानों से जुड़ी संस्थाएं हैं। निहित हितों और स्वार्थ की पूर्ति के लिए मीडिया सबसे पावरफुल माध्यम है, ऐसा बहुत लोगों का मानना है।



  • समाचार को लेकर बहुत सी परिभाषाएं प्रचलित हैं। कहा जाता है कि वह सभी कुछ, जिससे आप कल तक अनभिज्ञ थे, समाचार है। इसके उलट यह भी कहा जाता है कि हर घटना समाचार नहीं है। सिर्फ वही घटना समाचार बन सकती है, जिसका कमोबेश सार्वजनिक महत्व हो। एक अन्य परिभाषा में कहा गया है कि समाचार वह उत्तेजक सूचना है, जिससे कोई व्यक्ति संतोष अथवा उत्तेजना प्राप्त कर सकता है। पत्रकार सामाजिक सरोकार का न्यासी होता है। पत्रकार केवल सूचना का संवाहक और संप्रेषक होता है, उत्पादक नहीं। इस सूचना समय में क्या आपको ऐसा लगता है? यहां तो कोई भी टीवी चैनल देखो, कुछ खास साइट को खोलो तो उनका एजेंडा बहुत साफ दिखाई देता है। मीडिया के बहुत सारे एंकर तो किसी माफिया की तरह लोगों को डराते, धमकाते और पहले से तयशुदा एजेंडे पर अपनी बात को मनवाते दिखते हैं। इधर के दिनों में मीडिया में एक शब्द प्रचलन में है वो है गोदी मीडिया। कबीरदास जी ने कहा है कि 'सब कहते कागद की लेखी, मैं कहता आंखन की देखी।

    हम आज जो टीवी चैनल, सोशल मीडिया के जरिये आंखन देखी, देख रहे हैं, क्या वह पूरा सच है? फेक न्यूज के इस दौर में सच, झूठ का पता लगाना मुश्किल हो रहा है। बार-बार फैलाए, दिखाये जा रहे झूठ को लोग सच समझने लगते हैं। हिटलर के प्रचार मंत्री डॉ. जोसेफ गोयबल्स की तरह बार-बार कहे जाने वाले झूठ को भी लोग सच समझने लगते हैं। हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी मीडिया में छाये रहते हैं। ये मोदी जी का ही जादू है कि उन्होंने आकाशवाणी और दूरदर्शन को फिर से उपयोगी बना दिया। मोदी जी बहुत 'चूजी हैं। कपड़ों से लेकर चश्मों तक, व्यक्ति से लेकर मीडिया तक, वे बहुत सिलेक्टिव हैं। मीडिया में हमेशा छाये रहने वाले मोदीजी को क्या आपने कभी ओपन हाउस में मीडिया से बातचीत करते, उनके प्रश्नों के जवाब देते सुना है। मोदीजी अपने साथ यात्रा में पूर्व के प्रधानमंत्री की तरह देशभर के मीडिया वालों को ले जाने की बजाय अपनी सरकार के नियंत्रण वाले आकाशवाणी, दूरदर्शन और ए.एन.आई. को ही ले जाते हैं। जब भी उन्हें अपनी बात कहनी होती है तो वे उन्हीं चैनल, उन्हीं पत्रकारों को चुनते हैं, जो उन्हें शूट करते हैं। जरूरत पड़ने पर वे कभी फिल्म अभिनेता अक्षय कुमार को इंटरव्यू देते हैं या गीतकार प्रसून जोशी को। उन्हें करन थापर, राजीव सरदेसाई, पुण्य प्रसून वाजपेयी, विनोद दुआ और रवीश कुमार जैसे पत्रकार रास नहीं आते। उनकी पहली पसंद अर्णब गोस्वामी, रजत शर्मा जैसे लोग हैं।

    आकाशवाणी से 65 बार 'मन की बात करने वाले मोदीजी, दूसरों की बात नहीं सुनना चाहते। वे बातचीत के लिए पंचायत प्रतिनिधियों को, स्कूली बच्चों को या फिर ऐसे ही कुछ समूहों को चुनते हैं जिन्हें पहले से प्रश्न देकर अधिकारियों द्वारा 'ब्रीफ कर दिया जाता है। मोदीजी को सवालिया मीडिया से परहेज है। अपनी पहली पारी के अंतिम 6 महीने से वे उसी पत्रकार से मिले, जो उन्हें अच्छा लगा। यदि वे 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले अमित शाह के साथ पत्रकारवार्ता में आये भी तो चुप रहे। पत्रकारों ने जब प्रधानमंत्री से सवाल पूछा तो अमित शाह ने कहा कि उन्हें जवाब देने की आवश्यकता नहीं है। अपने दूसरे कार्यकाल के एक वर्ष होने पर भी उन्होंने अपने चार मंत्रियों को प्रेस से रूबरू होने की जिम्मेदारी दी, वे खुद नहीं आये। मोदीजी के मित्र डोनाल्ड ट्रम्प के देश का मीडिया, जार्ज फ्लॉयड नामक एक अश्वेत व्यक्ति की मृत्यु पर आसमान सर पर उठाकर 25 शहरों में कफर्यू लगाकर ट्रम्प साहब को बंकर में छिपने मजबूर कर देता है किंतु हमारे यहां सैकड़ों मजदूरों के मरने के बाद भी सुप्रीम कोर्ट में देश के सॉलिसिटर जनरल मेहता, मजदूरों की थोड़ी बहुत व्यथा दिखाने वाले मीडिया को और मजदूरों को सरेआम कोसते हैं और पूरा देश चुप रहता है। जो लोग विरोध में आवाजे उठाते हैं, उन्हें टुकड़ा-टुकड़ा गैंग, अर्बन नक्सलाइट करार दिया जाता है।

    ग्रेट ब्रिटेन से लेकर मिलेट्री हुकूमत के साये में शासन करने वाले पाकिस्तान में भी मीडिया जिस तरह से सत्ता की खुलेआम आलोचना करता है, वैसा स्वर हमें, हमारे देश में बहुत कम देखने मिलता है। आलोचकों को डराने, धमकाने और किसी न किसी तरह उनकी कलम और मुंह बंद करने की कोशिश हमारे यहां हमेशा से होती आई है। आपातकाल में खुलेआम मीडिया पर सेंसरशिप लगाई गई थी। लालकृष्ण आडवाणी ने इसका प्रभावशाली रूप से वर्णन करते हुए कहा, "मीडिया तो रेंगने लगी जबकि उन्हें केवल झुकने को कहा गया था ।  झुको लेकिन वे घुटनों के बल रेंगने लगे।' सत्ता किसी की भी हो, वह अपने तरीके से अपनी प्रशस्ति चाहती है। आलोचना का स्वर किसी भी सत्ताधीश को पसंद नहीं है, चाहे आप कितना ही कहे की 'निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छबाए। बहुत सारे छोटे-छोटे हाउस, अखबार और सोशल मीडिया के जरिये अपनी बात निर्भीकता से कहने का साहस रखने वाले लोगों में पूंजी के बढ़ते प्रभाव और लोगों की फ्री फंड की आदत के कारण एक नैराश्य भाव जाग रहा है। 

  • ब्रिटेन की सरकारी एजेंसी बी.बी.सी. अपनी स्वायत्तता और आर्थिक स्वावलंबन के कारण सैकड़ों बार ऐसी बातें प्रसारित करता है, जो वहां की सरकार के खिलाफ है। हमारे यहां का दूरदर्शन, आकाशवाणी ऐसा करने की सोच भी नहीं सकता। कारपोरेट पूंजी से चलने वाला मीडिया और अलग-अलग जगहों पर मीडिया की आड़ में अपना धंधा-पानी बढ़ाने वाले व्यापारियों द्वारा संचालित मीडिया से बहुत ज्यादा अपेक्षा बेमानी है। यदि हमारा दर्शक, पाठक चाहता है कि उसे विश्वसनीय और सही खबरें मिले तो इसके लिए उसे भी इसकी कीमत चुकानी होगी। फ्री के चांवल में जिस तरह गुणवत्ता कम और कनकी की मात्रा ज्यादा होती है। वैसे ही फ्री की खबरों के साथ होगा। खबरों को बनाये रखने के लिए जहां से खाद पानी मिलेगा, खबरें वहीं की तो लहलहायेंगी।

    यह सही है कि देश की जनता निष्पक्ष दिखने वाला मीडिया चाहती है। बहुत सारे मीडिया हाउस अपने चाल चरित्र में निष्पक्ष होने का स्वांग भी करते हैं। किसी एक विचारधारा या पार्टी से जुड़ा मीडिया अपने सीमित पाठकों के कारण लंबे समय तक नहीं चल पाता फिर चाहे वह कांग्रेस पार्टी हो या भारतीय जनता पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी या शिवसेना। पांचजन्य, नेशनल हेराल्ड, युगधर्म, तरूण भारत जैसे बहुत से नाम है जो कालांतर में प्रारंभ होकर या तो बंद हो गये या सीमित हो गये। यदि इन पार्टियों से जुड़े कार्यकर्ता ही इन्हें खरीदते तो ये लाखों में बिकते और इन्हें असमय बंद नहीं होना पड़ता, इनकी प्रसार संख्या लाखों में होती। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद सबसे पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी के पुत्र अमित जोगी ने यहां के एक इलेक्ट्रानिक मीडिया अपने नियंत्रण में लिया किंतु उनका यह प्रयास सफल नहीं हुआ। उसके बाद लगातार प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में नेताओं की भागीदारी मीडिया हाउसेस में होनी लगी। अपने पसंद के पत्रकारों को मीडिया हाउस में रखना, उनकी वेबसाइट को उपकृत करना या उन्हें सामने रखकर वेबसाइट संचालित करना, यह सिलसिला निरंतर जारी है। ऐसा करने के पीछे एक ही मकसद है कि उनका काम-धंधा चलता रहे और उनके विरोधियों की खोज खबर ली जा सके।

    बहुत सारे व्यापारिक घराने अपना रूतबा सरकारी महकमों में और राजनीतिक क्षेत्र में बनाये रखने और अपने धंधे के काले कारनामों को आड़ देने के लिए भी मीडिया हाउस चलाते दिख जायेंगे। नेताओं के इस खेल में बहुत से अफसर भी शामिल हो गये, जो नेपथ्य में रहकर अपने प्रतिद्वंदियों को निपटा रहे हैं। सूचना का अधिकार हो या वेबपोर्टल, दोनों का सर्वाधिक उपयोग अपने दुश्मनों को निपटाना रहा है। अभिव्यक्ति की आजादी का यह क्या खेल नवधनाढ्य नेताओं, पूंजीपतियों और अफसरों को रास आने लगा है। उन्हें मुक्तिबोध की तरह अभिव्यक्ति के खतरे नहीं उठाने होंगे।

    देश के ख्यातिनामा पत्रकार करण थापर ने 2007 को अहमदाबाद में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी से जैसे ही अपने तयशुदा एक घंटे के साक्षात्कार के प्रारंभ में गुजरात सांप्रदायिक सवाल पूछना और उन्हें कोर्ट द्वारा नीरो' कहने जाने की बात पर जवाब चाहा तो उन्होंने कहा कि 2007 में 2022 के बारे में सवालों के जवाब देना जरूरी नहीं है। उन्होंने अपना साक्षात्कार बीच में ही छोड़ दिया और चले गये, फिर कोई साक्षात्कार उन्होंने नहीं दिया। इसके बाद 2016 में करण थापर लिखते हैं, 'मोदी सरकार के मंत्रियों ने उन्हें साक्षात्कार देना बंद कर दिया। उनके द्वारा संचालित पैनल में भाजपा के लोगों ने आना बंद कर दिया। मोदीजी ने अपने पहले कार्यकाल  में और अब तक के दूसरे कार्यकाल में अपनी सफल रणनीति के चलते सवालिया मीडिया से दूरी बनाये रखते हुए, मीडिया में अपनी सर्वाधिक उपस्थिति दर्ज करायी है। हमारे देश का मीडिया खास करके उसमें काम करने वाले पत्रकारों की मोदीजी की नजर में कोई खास अहमियत नहीं है। वे अच्छे से जानते हैं कि जिस दिन भी पीएमओ से जिस पत्रकार, मीडिया हाउस को इंटरव्यू के लिए बुलाया जाएगा, वह दौड़ा चला आएगा। मोदीजी 2024 के चुनाव के समय कुछ चुने हुए नेशनल और रीजनल चैनल अखबार को इंटरव्यू देकर अपने मन की बात का विस्तार करेंगे। देश के लोगों को लगेगा कि ये आपसी संवाद के लिए कितने सहज प्रधानमंत्री हैं, जबकि हकीकत में यहां भी मोनोलॉग होकर, इंटरव्यू लेने वाले पत्रकार, एंकर जो सवाल पूछेंगे, वे पहले से तय होंगे। यह एक तरह की नूराकुश्ती है।

    ( लेखक दैनिक आज की जनधारा तथा वेब मीडिया हाउस के प्रधान संपादक हैं )