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फिल्म समीक्षा: ‘द स्काई इज़ पिंक’ एक ज़रूर देखी जाने वाली फिल्म है

फिल्म समीक्षा: ‘द स्काई इज़ पिंक’ एक ज़रूर देखी जाने वाली फिल्म है

अंजलि मिश्रा

निर्देशक: शोनाली बोस

लेखक: शोनाली बोस, जूही चतुर्वेदी

कलाकार: प्रियंका चोपड़ा, फरहान अख्तर, ज़ायरा वसीम, रोहित सर्राफ

रेटिंग: 3/5

‘मैं यहां पर बैठकर ये शब्द लिख रही हूं, यह भी एक चमत्कार है. अगर किस्मत ने अपना इरादा बदल नहीं लिया होता तो शायद मैं इस धरती पर एक साल से ज्यादा नहीं टिक पाती.’ इन शब्दों के साथ आयशा चौधरी की किताब ‘माय लिटिल एपिफेनीज’ शुरू होती है. अगर आप आयशा की कहानी जानते तो समझते कि ये दो लाइनें ही उनकी जिंदगी और जीने के जज़्बे की कहानी कह देती हैं.

महज 18 साल जीकर मोटिवेशनल स्पीकर के तौर पर पहचान बनाने वाली आयशा चौधरी जन्म से सिवियर कंबाइन्ड इम्यून डेफिशंसी नामक डिसॉर्डर का शिकार थीं. यह एक ऐसा डिसॉर्डर है जिसके चलते शरीर में कोई रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित नहीं होती है और ऐसे में कोई बहुत मामूली इंफेक्शन भी जानलेवा साबित होता है. ‘द स्काई इज़ पिंक’ इस बीमारी से जूझती आयशा के अठारह सालों का सफर दिखाती है. इसके बहाने यह उसके मां-बाप के उन संघर्षों और साहस की झलक भी दिखाती है जिसने उसकी उम्र को कुछ दिनों से बढ़ाकर सालों में बदल दिया. ऐसा करते हुए फिल्म बिना कहे बार-बार दोहराती है कि जीवन ठीक वैसा ही है जैसा आप उसे बनाना चाहते हैं. ज़िंदगी की तमाम चुनौतियों के बावज़ूद इसे मनचाहे रंग में ढालना भी उतना ही आसान है जितना ड्राइंग बुक में अपने आसमान को नीले की बजाय गुलाबी रंग में रंग देना.

‘द स्काई इज़ पिंक’, फिल्मकार शोनाली बोस की उस ट्रायलजी की तीसरी कड़ी है, जिसमें उन्होंने मां-बेटी की सुंदर और अनोखी कहानियां परदे पर उकेरी हैं. उनकी पहली फिल्म ‘अमु’ एक ऐसी लड़की की कहानी थी जिसने 1984 के दंगों में अपनी मां को खो दिया था और वयस्क होने के बाद वह अपनी मां और परिवार को खोजने निकलती है. वहीं, ‘मार्गरीटा विद अ स्ट्रॉ’ सेरेब्रल पाल्सी से ग्रस्त एक टीनएजर और उसकी मां के बीच के रिश्ते को एक्प्लोर करती है. हालांकि सिनेमाई पैमानों पर ‘द स्काई इज़ पिंक’ उनकी बाकी दो फिल्मों से कमतर रह जाती है लेकिन यह इन मायनों में खास है कि मां-बेटी के साथ यह एक परिवार की कहानी भी बन जाती है.

‘द स्काई इज पिंक’ को आसमान की ऊंचाई इसके कलाकारों के बेहतरीन अभिनय से मिलती है. प्रियंका चोपड़ा ने फिल्म में ममता और जोश से भरी युवा मां से लेकर, बेटी को खोने के बाद सूनेपन से जूझने वाली अधेड़ मां तक के किरदार को जिया है. अपने इस इतने फैले हुए किरदार के अलग-अलग शेड्स को जिस ईमानदारी से उन्होंने परदे पर ज़िंदा किया है उसे 2-4 लाइनों में बता पाना मुश्किल है. उनके इस किरदार में अगर कोई कमी निकालनी ही हो तो अधिक से अधिक यही कहा जा सकता है कि वे इसमें ज्यादातर वक्त ग्लैमरस लगती रहती हैं. पर कोई मां ग्लैमरस नहीं हो सकती यह किस किताब में लिखा है!

तकरीबन तीन साल बाद, परदे पर नज़र आने वाले फरहान अख्तर फिल्म में बहुत संतुलित और सधा हुआ अभिनय करते हैं. अगर कोई यह जानना चाहे कि अभिनय में ‘मिनिमलिज्म’ कैसा होता है तो वह ‘द स्काई इज़ पिंक’ में अख्तर को देखकर इसे समझ सकता है. न्यूनतम लेकिन सटीक एक्सप्रेशन्स देते हुए वे कुछ इमोशनल दृश्यों में इतना कमाल हो जाते हैं कि आप बेसाख्ता आंसू बहाने पर मजबूर हो सकते हैं. इतना ही बढ़िया काम फिल्म में आयशा चौधरी बनी ज़ायरा वसीम भी करती हैं और उनको देखकर बस यही कहने का मन होता है कि बॉलीवुड छोड़ने का उनका फैसला इंडस्ट्री का एक बड़ा नुकसान है. ‘डियर ज़िंदगी’ में किडो की भूमिका निभाने वाले रोहित सर्राफ एक बार फिर से भाई की भूमिका में हैं और फिर से बेहतरीन काम करते दिखाई देते हैं.

फिल्म के बाकी पक्षों पर गौर करें तो कई दशकों को दिखाने के लिए जरूरी बारीकियों का फिल्म में अच्छे से ध्यान रखा गया है जो दृश्यों को विश्वसनीय बनाने में मदद करता है. फिल्म में गुलज़ार के लिखे गानों के सुंदर बोल आपका ध्यान खींचते हैं लेकिन प्रीतम का संगीत बहुत असर नहीं डाल पाता है. कुछ और कमियों की बात करें तो सही सीक्वेंसिंग और बेहतर संपादन से ‘द स्काई इज़ पिंक’ की लंबाई कुछ कम की जा सकती थी. कुछ मौकों पर इमोशनल या कॉमिक होने की कोशिश में यह जरूरत से ज्यादा मेलोड्रामैटिक भी हो जाती है और यह भी खटकता है. लेकिन फिर भी असली जीवन से फिल्म के तगड़े कनेक्शन के चलते आप आसमान के गुलाबी हो सकने का यकीन कर बैठते हैं.

‘द स्काई इज़ पिंक’ एक ज़रूर देखी जाने वाली फिल्म है और जिंदगी हर सांस के साथ जीने वाली चीज़, इसे आप इस वीडियो को देखकर भी समझ सकते हैं.